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________________ ( ११० ) उदय चौदहवें गुणस्थान तक है । दुर्भग, दुःस्वर, अनादेयका बंध दूसरे गुणस्थान तक और उदय दुर्भग अन देयका चौथेतक दुस्वरका तेरहवें गुणस्थान तक है । तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध चौथे गुणस्थानसे आठवेंके छ -भाग तक और उदय तेरहवें से चौदहवें गुणस्थान तक है । पंचपरावर्तनका स्वरूप । भाव परावर्तन अनंत भाग भवकाल, भव परावर्तन अनंत भाग काल है । काल परावर्तन अनन्त भाग खेत कह्यौ, खेतको अनन्त भाग पुग्गल विसाल है || ताकौ आधौ नाम अर्ध पुग्गल परावर्तन, फिर रह्यौ है याहि ग्यानी ग्यान भाल है । ताही समै सम्यक उपजिवेकौ जोग भयो, और कहा समकित लरकौंका ख्याल है ॥ ७६ ॥ अर्थ- कर्मबंधोंके करनेवाले जितने प्रकार के भाव हैं, उन सबको मिथ्याती जीव क्रमपूर्वक जितने समय में अनुभव करता है उतने कालको एक भावपरावर्तन काल कहते हैं । इस भावपरावर्तनका जितना काल है, उसका अनन्तवां भाग काल भवपरावर्तनका है । नरकगति तथा देवगतिका जघन्य आयु दशहजार वर्षका और उत्कृष्ट आयु वेतीस
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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