SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 122
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (१०९) असातावेदनीयका बंध छट्ठे गुणस्थान तक और उदय चौदहवें गुणस्थान तक है । नपुंसक वेदका बंध पहले गुणस्थान में है, और उदय नववे गुणस्थानके चौथे भाग तक है । स्त्रीवेदका बंध दूसरे गुणस्थानतक और उदय नववें गुणस्थानके चौथे भाग तक है । संज्वलन लोभका बंध नवर्वे गुणस्थान पर्यन्त और उदय दश गुणस्थान तक है । अरति शोकका बंध छट्टै गुणस्थान तक और उदय आठवे गुणस्थान तक है । निद्रा प्रचलाका बन्ध आठवें गुणस्थानके पहले भाग तक और उदय बारहवें तक है । स्थावरका बंध पहले गुणस्थान में और उदय दूसरे गुणस्थान तक है । स, बादर और पर्याप्तका बंध आठवेंके छठे भाग तक: और उदय चौदहवें पर्यन्त है । प्रत्येकशरीरका बन्ध आठवेंके छठे भाग तक और उदय तेरहवें तक है । अस्थिर अशुभका बन्ध छट्ठे तक और उदय तेरहवें तकहोता है । स्थिर, शुभ और सुस्वरका बंध आठवेंके छठे भाग तक और उदय तेरहवें गुणस्थान तक है । सुभग और आदेयका बंध आठवेंके छठे भाग तक और
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy