SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 118
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (१०५) सत्तर हजार नौसै सतसठ जोजन है, तेइस अधिक भाग इकतीसका गहा । तेसठ इंद्रक नाम तेसठ ही जिनधाम, बंदों मनवचकाय तिनकी सोभा महा ॥७४॥ अर्थ-पहले युगलका जो ऋजुविमान नामका पटल है, वह ४५ लाख योजनका है और अन्तका सर्वार्थसिद्धि नामका पटल एक लाख योजनका है । स्वर्गलोकके सारे पटलोंकी संख्या ६३ है। इस तरह ६२ स्थानोंमें ४४ लाख कमसे कम हुए हैं । तो अब देखना चाहिये कि एक दूसरेसे कितने कितने कम होते गये हैं:-४४ लाखमें यदि ६२ स्थानोंका भाग दिया जायगा, तो यह कमी मालूम हो जायगी । ४४०००००-७०९६७३१ अर्थात् सत्तर हजार नौ सौ सड़सठ और एक योजनके ३१ भागोंमेंसे २३ भाग; इतना इतना विस्तार ऊपर ऊपरके पटलोंका कम होता गया है । इन ६३ इन्द्रकोंमें ६३ ही अकृत्रिम जिनमंदिर हैं, जो अतिशय शोभायुक्त हैं । उनकी मैं मन वचन कायसे बन्दना करता हूं। १२० प्रकृतियोंका बंध और उदय । देव गति आव आनुपूरवी प्रकृति तीन, वैक्रियक अंग आहारक अंग चार हैं। अजस ए आठौं ऊंचैं बँधैं नीचें उदै हिं, संजुलनं लोभ विनां पंदरै निहार हैं ॥
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy