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________________ (९२) प्रचला प्रचलाप्रचला थानगृद्धि नौ भेद, दर्सनावरनी, मोह अठाईस भेद हैं । दान लाभ भोग उपभोग बल अंतराय, पांच सब सैंतालीस घातिया निषेद हैं ॥६५॥ अर्थ-ज्ञानावरणीयकी ५, दर्शनावरणीयकी ९, मोहनीयकी २८ और अन्तरायकी ५ इस तरह घाती कर्मोंकी सब मिलाकर ४७ प्रकृतियां हैं। इन सबको जुदा जुदा बतलाते हैं । ज्ञानको आवरण करनेवाले ज्ञानावरणीयके पांच भेद हैं-१ मतिज्ञानावरण, २ श्रुतज्ञानावरण, ३ अवधिज्ञानावरण, ४ मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण । दर्शनावरणीयके ९ भेद हैं-१ चक्षुर्दर्शनावरण, २ अचक्षुर्दर्शनावरण, ३ अवधिदर्शनावरण, ४ केवलदर्शनावरण (ये चार आवरण), ५ निद्रा, ६ निद्रानिद्रा, ७ प्रचला, ८ प्रचलाप्रचला और ९ स्त्यानगृद्धि । मोहनीयके २८ भेद हैं (ये आगेके पद्यमें बतलाये हैं ) । अन्तरायके ५ भेद हैं-१ दानान्तराय, २ लाभान्तराय, ३ भोगान्तराय, ४ उपभोगान्तराय, और ५ वीर्यान्तराय । घाती कर्मोंकी ये ४७ प्रकतियां निषिध्य हैं-इनको आत्मासे जुदा करना चाहिये । मोहनीय कर्मकी २८ प्रकृतियां। अनंतानुबंधी औ अप्रत्याख्यानी प्रत्याख्यानी, संज्वलन चारौं क्रोध मान माया लोभ है।
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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