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________________ (९१) अग्निकाय, वायुकाय और साधारण वनस्पतिकाय इन पांचके सूक्ष्म और वादरके भेदसे दश भेद हुए । इनमें एक प्रत्येक वनस्पतिकाय मिलानेसे ग्यारह भेद हुए । इन ग्यारहों लब्ध्यपर्याप्तक जीवोंके अन्तर्मुहूर्तमें छह हजार बारह बारह जन्म मरण होते हैं । दो इंद्रिय जीवोंके ८०, तेइंद्रियके ६०, चौइंद्रीके ४० और पंचेंद्री जीवोंके चौवीस चौवीस जन्म मरण होते हैं । इस तरह सब मिलाकर ६०१२४११+८०+६+४०+२४-६६३३६ जन्म मरण अन्तर्मुहर्तमें होते हैं । ३७७३ स्वासका एक प्रमाण मुहूर्त होता है । एक स्वासमें अठारह बार जन्म मरण होता है, इसलिये ६६३३६ जन्म मरणमें EESE=३६८५१ स्वास हुए । और इन ३६८५ स्वासोंका एक अन्तर्मुहूर्त हुआ। मैं अपने नाथ अर्थात् वीतरागदेवको नमस्कार करता हूं। मेरा इन जन्म मरणके दुःखोंसे वे ही उद्धार करेंगे । घाती कर्मोंकी ४७ प्रकृतियां। मति सुत औधि मनपरजै केवलग्यान, पंच आवरन ग्यानावरनी पंचभेद हैं । चक्खु औ अचक्खु औधि केवलदरस चारि, आवरन चारि निद्रा निद्रानिद्रा खेद हैं ॥ १ जो बालक न हो, वृद्ध न हो, रोगी न हो, आलसी न हो, ऐसे स्वस्थ सुखी मनुष्यके स्वास इस प्रसंगमें लिये गये हैं।
SR No.090117
Book TitleCharcha Shatak
Original Sutra AuthorDyanatray
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1926
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Principle
File Size9 MB
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