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________________ सिरि भूवलय सय सिद्धि संपगलोर-दिल्ली उनका सुख हमको प्राप्त हो ।।३।। तो उन ग्रन्थों में इतने विषय समावेश नहीं कर सकते थे, परन्तु अनादि काल से इन सब को बतलाने वाला यह नव पद काव्य नामक भवलय है ||२४ चले आये दिव्य ध्वनि के आधार से सम्पूर्ण विषयों को आदि से लेकर अनंत प्रश्न ? काल तक ०, १.२, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९ अंकों में गभित करते हुए ६ द्रव्य, ५ अस्तिकाय, ७ तत्व, ६ पदार्थ ये मिलकर २७ हुए। २७ । उन अंकों में परस्पर गुणाकार करते हुए अनंत गुणाकार तक अर्थात् सिद्धचक्र कोष्ट भूवलय में हैं तब आप नवपद भूवलय कसे कहते हैं ? भगवान के अनंत ज्ञान तक ले जाकर उस महान् अंक राशि को अर्धच्छेद रूप उत्तर-२७ सत्ताईस संख्या के अंक ७१ २ जोड़ देने से होते हैं इस 1 गणित रूपी शस्त्र द्वारा काटते हुए जघन्य संख्या से २ तक लाकर दिखाने के लिए नव पद से निर्मित भूवलय है। लिए चक बंध रूप २७४२७ कोठा बना कर अनेक प्रकार की पद्धति से सिद्ध लोक के अग्रभाग की तरफ गमन अर्थात् उपयोग करने वाले योगी-निकाल कर ग्रंक रूप कोष्ठक में भरा है। वह कोष्टक अनेक विकल्प रूप है। राज विश्व के अधिपति हुए, सिद्ध परमात्मा वेद अर्थात् जिन वापी रूप हैं। वे विकल्प कितने प्रकार के हैं ? जितनी अर्घच्छेद-शलाकाय हैं उतने मात्र हैं। ऐसे ध्यान करते हुए अपनी पारमा को प्रफुल्लित करने वाला यह विश्वज्ञ काव्य अर्थच्छेद-शलाफा कितने प्रकार की हैं ? इसके उत्तर में प्राचार्य समाधान सभी काव्यों में अग्रसर है, अर्थात् यह अग्रायणोय पूर्व से निकला हुआ करते है कि हमने उसे अनन्त राशि से लिया है। हमारे अनंत बार अर्धच्छेद काव्य है ।१८५॥ करते चले ग्राने पर भी वह शलाकाछेद भी अनन्त होना अनिवार्य है। यह काव्य परहंत परमेष्ठी को दिव्य वाणी के अनुसार और श्री वृषभ- अर्थात् वह अनन्त अर्धच्छेद हैं । इन समस्त अनन्त राशियों को उपयुक्त सेनादि प्राचार्य परंपरा के आदि पद से आने के कारण परमामृत काव्य अति। कोष्ठकों में संख्याल रूप से हम भर चुके हैं । इसलिए समस्त भूवलय में समस्त अत्यन्त उत्कृष्ट अमृतमय काय है। अपने को गुग या अरहन या सिद्ध पद प्राप्ति विषयों को गभित करने में हम समर्थ हए । मंगल प्राभूत के इस चौथे 'इ'पध्याय को जो इच्छा रखता है उन्हीं को यह भूवलय काव्य रास्ते में सरस (मुगम) के अक्षर रूपी काव्य में जो भिन्न २ प्रकार की भाषायें और विषय उपलब्ध होते विद्यागम को पढ़ाते हुए अंत में परम कल्याण कर देने वाला है ।।६।। हैं. वे बड़े महत्वशाली तथा रचिकर श्लोक है। इसे देखकर पाठकगण को विवेचन-यहां तक कुमुदेन्दु आचार्य ने ५६ दलांक तक अरहंत की अंतरंग । स्वाभाविक रूप से प्रानन्द प्राप्त होगा ही, किन्तु उन्हें सावधान रहकर केवल सम्पत्ति के बारे में, मिद भगवान के गुणों के बारे में पौर, नीनों गुम आदि । प्रस्तुत पानन्द में ही रत नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि यदि वे केवल इसी में समस्त प्राचार्यों के शीलगुणादिक के वर्णन में ६ द्रव्य, ५ अस्तिकाय, सात । मग्न रहेंगे तो आगे आने वाले अत्यन्त सूक्ष्म विषय को समझ नहीं सकेंगे। तत्व और नी पदार्थादिक के वर्णन में यहत सुन्दरता के साथ लिख है। ये नम्म ज्ञानवदेष्टु निम्म ज्ञानवदेष्ट्र, नम्मनिमेल्लरगें पेळय । सव तीन लोक के अंतर्गत हैं; इतने गहान होते हुए भी इनका एक जीवात्मा के नम्म सर्वज्ञ देवन ज्ञान वेष्टॅब हेम्मेय गणित शास्त्र दोछु । ज्ञानके अंदर समावेश है । ऐसे जोव संख्या में अनन्त हैं। उन अनंतों में से प्रत्येक जीव के अंदर अपर कह हुए समस्त विषय समाविष्ट हैं। उन सब विषयों को श्री नम्मय गरिणत शास्त्रदोळ । निम्मय गणित शास्त्र दोळु ॥ कुमुदेन्दु प्राचार्य ने एकत्र रूप में अपने भूवलय ग्रन्थ में समाविष्ट किया है। यह इत्यादि-- किस तरह से समाविष्ट है ? इस का उत्तर निम्नलिखित श्लोकों में निरूपण अर्थात् हमारा ज्ञान कितना है, तुम्हारा ज्ञान कितना है तथा हम सब किया है। हम पहिले से हो लिखते आए हैं कि इस भूवलय में कोई भी को सदुपदेश देकर सन्मार्ग पर लगाने वाले सर्वज्ञ भगवान् का ज्ञान कितना है ? अक्षर नहीं है । यदि भिन्न-भिन्न अन्यों की रचना जैसे का तैसा भिन्न-भिन्न करते । इन सब को बताने वाला गौरव शाली यह गणितशास्त्र भूवलय है। यह गणित
SR No.090109
Book TitleSiri Bhuvalay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhuvalay Prakashan Samiti Delhi
PublisherBhuvalay Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Principle
File Size10 MB
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