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________________ १५६ इस प्रकार समाहित होकर त्रयात्मक ध्यान को ध्याता हुमा उत्कृष्ट शुद्धि को प्राप्त कर लेता है, जो कि मुक्तिलक्ष्मी रूपी स्त्री की सखी है । यद्यपि प्रतिपात्येतच्छुक्लध्यानं प्रजायते । तथाप्यतिविशुद्धत्वादूर्ध्वास्पदं समीहते ॥ ७०७॥ यद्यपि यह शुक्लध्यान प्रतिपाती उत्पन्न होता है, तथापि प्रति विशुद्ध होने से ऊँचा स्थान प्राप्त करता है । इत्यष्टमं क्षपकापूर्वकरण गुणस्थान । निवृत्तिगुणस्थानं ततः समधिगच्छति । भावं क्षायिकमाश्रित्य सम्यक्त्वं च तथाविधम् ॥७०८ ॥ अनन्तर निवृत्ति गुणस्थान को प्राप्त होता है । क्षायिक भाव का आश्रय कर क्षायिक सम्यक्त्व होता है । गुणस्थानस्य तस्यैव भागेषु नवसु क्रमात् । नश्यन्ति तानि कर्माणि तेनैव ध्यानयोगतः ॥७०६ ॥ उस गुणस्थान के ही नव भागों में क्रम से उसी ध्यानयोग से वे कर्म नष्ट हो जाते हैं.! गतिः श्वाभ्री च तैरची तच्चानुपूर्विकाद्वयम् । साधारणत्वमुद्योतः सूक्ष्मत्वं विकलत्रयम् ॥७१०॥ एकेन्द्रियत्वमातापस्त्यानगृद्धयादिकत्रयम् । प्राद्यांशे स्थावरत्वेन सहितान्येतानि षोडश ॥७११॥ अष्टौ मध्यकषायाश्रच द्वितीयेऽथ तृतीयके । षंढत्वं तुर्य के स्त्रीत्वं नोकषायाषट्पंचमे ॥७१२॥
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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