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________________ १४६ तत्रापूर्वगुणस्थाने प्रथ' मांशे प्रजायते । बन्धविच्छेदनं सम्यङ्ग निद्राप्रचलयोर्द्वयोः ॥६७४॥ अपूर्वकरण गुणस्थान के प्रथम भाग में निद्रा और प्रचला दो प्रकृतियों की भले प्रकार बन्धव्युच्छित्ति होती है । आरोहति ततः श्रेणिमादिमामुपशामकः । सत्यायुष्युपशान्त्याप्तिं प्राप्येद्वत्तमोहनम् ॥६७५॥ अनन्तर आदि की उपशम श्रेणी पर आरोहण करता है। आयुकर्म की उपशान्ति होने पर चारित्र मोह को प्राप्त करता है। क्षपकः क्षपयत्युच्चैश्चारित्रमोहपर्वतम् । प्रारुह्य क्षपक श्रेणिमुपयुपरि शुद्धितः ॥६७६॥ क्षपक ऊपर-ऊपर अत्यधिक शुद्धि से क्षपक श्रेणि पर आरोहण करके चारित्र मोह रूपी पर्वत का क्षय करता है । प्रभवत्युपशम श्रेण्यां भावो ह्य पशमात्मकः। चारित्रं तद्विधं ज्ञेयं वृत्तमाहोपशान्तितः ॥६७७॥ उपशम श्रेणी में उपशमात्मक भावों को करने में समर्थ होता है । चारित्र मोह की उपशान्ति से औपशमिक चारित्र जानना चाहिए। स्यादुपशमसम्यक्त्वं प्रशमाद् दृष्टिमोहतः।। केषांचित क्षायिकं प्रोक्तं दृष्टिनकर्मणः क्षणात् ॥६७८॥ १ प्रथम भागे। २ गाः ख. ।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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