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________________ ११४ उत्कृष्ट मध्यम क्लिष्टभेदात् पात्रं त्रिधा स्मृतम् । तत्रोत्तमं भवेत्पात्रं सर्वसंगोज्झितो यतिः ॥ ५१४ ॥ उत्कृष्ट, मध्यम और क्लिष्ट के भेद से पात्र तीन प्रकार का माना गया है । समस्त आसक्तियों का त्यागी यति उत्तम पात्र होता हैं । मध्यमं पात्रमुद्दिष्टं मुनिभिर्देश संयमी । जघन्यं प्रभवेत्पात्रं सम्यग्वष्टिरसंयतः ॥५१५॥ मुनियों ने देशसंयमी को मध्यम पात्र कहा है । संयत सम्यग्दृष्टि जधन्य पात्र है । रत्नत्रयोज्झितो देही करोति कुत्सितं तपः । ज्ञेयं तत्कुत्सितः पात्रं मिथ्याभावसमाश्रयात् ॥५१६॥ रत्नत्रय विहीन जीव जो कुत्सित तप करता हैं, उसे मिथ्याभाव का आश्रय लेने के कारण कुत्सित पात्र ( कुपात्र ) जानना चाहिए । न व्रतं दर्शनं शुद्ध ं न चास्ति नियतंः मनः । यस्य चास्ति क्रिया दुष्टा तदपात्रं बुधैः स्मृतम् ॥५१७॥ जिसका व्रत तथा दर्शन शुद्ध नहीं हैं और मन नियत नहीं हैं एवं क्रिया दोषयुक्त हैं, विद्वानों ने उसे प्रपात्र माना है । मुक्त्वात्र कुत्सितं पात्रमपात्रं च विशेषतः । पात्रदानविधिस्तत्र' प्रकथ्यते यथाक्रमम् ॥५१८ ॥ १ सम्यग्दृष्टि महामुनिः ख. । २ सूत्रे क. ।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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