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________________ १०१ स्थूलहिंसानृतस्तेयपरस्ती चाभिकांक्षता । अगुव्रतानि पंचैव तत्त्यागात्स्यादणुवत्री ॥४५१॥ स्थूल हिंसा, अमृत, स्तेय और परस्त्रो की अभिलाषा का का त्याग ये पाँच अणुव्रत होते हैं। इनके त्याग से अणुव्रती होता है। योगत्रयस्य सम्बन्धात्कृतानुमतकारितः। न हिनस्ति नसान स्थलहिंसावतमादिमम् ॥४५२॥ मन, वचन, काय के सम्बन्ध से कृत, कारित, अनुमोदना से त्रस जीवों की हिंसा न करना पहला स्थूल अहिंसावत है । न वदत्यनतं स्थलं न परान वादयत्यपि । जीवपीडाकरं सत्यं द्वितीयं तदणुव्रतम् ॥४५३॥ जो जीव पीड़ाकारी स्थूल झूठ नहीं बोलता है और न दूसरे से बुलवाता है । उसके द्वितीय सत्याणुव्रत होता है । प्रदत्तपरवित्तस्यः निक्षिप्तविस्मृतादितः। तत्परित्यजनं स्थूलमचौर्य व्रतभूचिरे ॥४५४॥ न दिए हुए धन का, धरोहर के भूल जाने आदि का परित्याग करना स्थूल अचौर्यव्रत कहलाता है । मातृवत्परनारीणां परित्यागस्त्रिशुद्धितः । ___ स स्यात्पराङ्गनात्यागो गृहिणां शुद्धचेतसाम् ॥४५५॥ मन, वचन, काय की शुद्धिपूर्वक माता के समान परस्त्री का त्याग करना शुद्ध चित्त वाले गृहस्थों का परस्त्री त्याग व्रत होता है। १ ति ख.।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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