SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 109
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १०० तस्मादनुमोद्दिष्टविरतौ द्वाविति क्रमात् । एकादश विकल्पाः स्युः श्रावकाणां क्रमादमी ॥४४७ ॥ दार्शनिक, व्रतिक, सामायिकव्रती, प्रोषधोपवासकृत, सचिन्ताहार त्यागी, दिवास्त्रीसेवन त्यागी, ब्रह्मचारी, निरारम्भी, परिग्रह त्यागी, अनुमतिविरत, उद्दिष्टविरत । इस प्रकार ये ग्यारह श्रावकों के क्रम होते हैं । गृही दर्शनिकस्तत्र सम्यक्त्वगुणभूषितः । संसारभोगनिर्विण्णो ज्ञानी जीवदयापरः ॥४४८ ॥ सम्यक्त्व रूपी गुण से भूषित दार्शनिक श्रावक संसार और भोग के प्रति विरक्त, ज्ञानी और जीवदयापरायण होता है। माक्षिकामिषद्य च सहोदुम्बरपंचकैः । वेश्या पराङ्गना चौर्यं द्य तं नो भजते हि सः ॥ ४४६॥ वह मद्य, माँस, मधु, पंच उदुम्बर फल, वेश्या, परस्त्री, चौर्य तथा जुए का सेवन नहीं करता है । दर्शनिकः प्रकुर्वीत निशि भोजनवर्जनम् । यतो नास्ति दयाधर्मो रात्रौ भुक्तिं प्रकुर्वतः ॥ ४५० ॥ दार्शनिक श्रावक रात्रि में भोजन नहीं करता है, क्योंकि रात्रि भोजन करने वाले के दयाधर्म नहीं है । दर्शनप्रतिमा |
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy