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________________ ६८ श्रविरियम्माइट्ठी णियमियवेलादियं ण कुव्वतो । पडि पडि दिणमिगिवारं सो झायदि अप्पगं सुद्धं ॥१॥ अविरति सम्यग्दृष्टि नियमित वेला में न कर भी दिन में एक बार शुद्ध आत्मा का ध्यान करता है । ईदृशं भेद मम्यक्त्वं साधकं निश्चयात्मनः । निश्चयात्म्यं निजात्यैव तत्साध्धं स्वान्मनीषिभिः ॥४३६ ॥ इस प्रकार के भेद वाला सम्यक्त्व निश्चयात्मा का साधक होता है । निश्चयात्मा निजात्मा ही है, वह मनीषियों के द्वारा साध्य है । संयत गुणस्थानं चतुर्थं प्रतिपादितम् । देश संयमिनो धाम पंचमं कथ्यतेऽधुना ॥ ४४०॥ चौथे असंयत गुणस्थान का प्रतिपादन किया गया । अब देशसंयमनामक पंचम गुणस्थान का कथन किया जाता है । इति चतुर्थ संयत गुणस्थानम् । तो देशव्रताभिख्येगुणस्थाने हि पंचमे । भावास्त्रयोsपि विद्यन्ते पूर्वोक्त लक्षणा इह ॥४४१ ॥ १ सुक्खं ख, अस्या अग्रे इमें अस्पष्टे गाथे ख- पुस्तके । तथा चोक्तं दशवैकालिकग्रन्थे- जो पुव्वस्त चरत्तकाले संपिक्खई अप्पगमप्पणेणं । किमेकदं किच्चमकिच्च सेसं कि सक्कणिज्जं णुसयाणरामि ||१|| कि मेरो पसइ किं व अप्पा दोसागयं किं ण विवज्जयामि । इच्चेव सम्मं प्रणुपस्समाणो ऋण (णा) गयं णी पडिबंध कुज्जा ।। २ ।
SR No.090105
Book TitleBhav Sangrah
Original Sutra AuthorVamdev Acharya
AuthorRamechandra Bijnaur
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages198
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Principle
File Size10 MB
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