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भट्टारक रत्नोति उत्वि
श्र उनमद मनसिज मान नीवारि रे ।
त्रोटक -
संभारी रे मुगसि मानिनी करि धरी रे ॥ २३ ॥
करि धरि वैराग्य वालो चालयो गिरिनारि । बार मास परीसा सहे किम रहे राहुल नारि ॥ निज मन्न ने तां तप सम्बोधी प्रती बोधी राहुल राज | मुगति पुरी गय नाथ नेमि जिन करी श्रातम काज || श्रीश्रभचन्द उदार अनुक्रमे प्रभेनन्दानन्द | तस चरण ग्रामी कहे यतिवर रत्नकीर्ति मुरिंगद || प्रेम भांरखी एह बाणी गासे द्वादश मास । तेहती श्री नेमि जिनवर बहू पूरे मन स || सायर सट घोघा गुणाले स्थालयचन्द | तिहां रही रचना रखीं बार मान भानन्द ।। २४ ।।
इति श्रीम. रत्नकीर्ति विरचिता बारहमासा समाप्त |
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