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________________ १३० भारतके दिगम्बर जैन तीर्थ पाटलिपुत्र सिद्धक्षेत्र पाटलिपुत्रका इतिहास ढाई हजार वर्ष प्राचीन है। प्राचीन साहित्यमें इसके कई नाम मिलते हैं जैसे कुसुमपुर, पुष्पपुर, पाटलिपुत्र। यह शताब्दियों तक राजनैतिक और सांस्कृतिक केन्द्र रहा। जैन साहित्यमें पाटलिपुत्रका स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है। जैन शास्त्रोंमें इस नगरको सिद्धक्षेत्र माना गया है। इसी नगरमें तपस्या करके मुनिराज सुदर्शनने निर्वाण प्राप्त किया था। मुनि सुदर्शनका जीवन बड़ा घटना-प्रधान रहा, अतः जैन जगत्में सुदर्शन ( पहले सेठ, बादमें मुनि ) का चरित बहुत विख्यात है। उनका चरित संक्षेपमें इस प्रकार है- अंगदेशकी राजधानी चम्पाके नरेश दधिवाहन थे। उनके राज्य में वषभदत्त सेठ रहते थे। उनकी पत्नी अहंद्दासी धर्मपरायण सतीसाध्वी थी। उनके एक पुत्र था। उसका रूप दर्शनीय था। इसलिए उसका नाम सुदर्शन रखा गया। जब सुदर्शन यौवन अवस्थाको प्राप्त हुए तो उनके माता-पिताने उनका विवाह मनोरमा नामक एक सुलक्षणा कन्याके साथ कर दिया। पत्नी जितनी सुन्दर थी, उतनी गुणवती भी थो । अतः पति-पत्नी दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे। • एक दिन सेठ वृषभदत्तके मनमें संसारकी दशाका चिन्तन करते हुए वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने समाधिगुप्त नामक मुनिराजके पास जाकर दीक्षा ले ली। अब सुदर्शन सेठ व्यापार सँभालने लगे। राज दरबारमें भी उनका बड़ा मान था। उन्होंने धन भी अजित किया और धर्म को ओरसे भी उदासीन नहीं रहे । वे प्रत्येक अष्टमी और चतुर्दशीको रात्रिमें श्मशानमें जाकर ध्यान लगाया करते थे। एक दिन महाराज दधिवाहन अपनी महारानी अभयाको लेकर वन-विहारके लिए गये । उनके साथ सेठ सुदर्शन, मन्त्रीगण, परिजन, पुरजन भी थे। महारानी अभया बार-बार उस सुदर्शन रूपवाले सुदर्शन सेठको देख रही थी। गठा हुआ शरीर, भरा हुआ यौवन, चमकती हुई आँखें, मुसकराता हुआ चेहरा। इन सबने मिलकर अभयाके मनको चंचल कर दिया। जब वनविहारसे लौटे तो अभया अपने कक्षमें जाकर पलंगपर पड़ गयी। वह काम-पीड़ित हो रही थी। उसकी विह्वल दशाको देखकर उसकी धायने रानीसे इसका कारण पूछा। रानी धायको अपनी अत्यन्त विश्वस्त और अन्तरंग समझकर बोली-"सुदर्शन सेठको देखकर मैं उसके ऊपर मोहित हो गयी हूँ। उसके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती। यदि तू मेरा जीवन चाहती है तो उसे मुझसे किसी उपायसे मिला दे।" धायने आश्वासन देकर महारानीसे सुदर्शनको मिलानेका वचन दिया। उस दिन धायने रात्रिमें प्रयत्न करके सेठ सुदर्शनको, जब वह श्मशानमें ध्यान लगाये हुए खड़े थे-उठवाकर महारानीके कक्षमें पहुंचा दिया। सुदर्शनको देखकर रानी बड़ी प्रसन्न हुई और कामसे पीड़ित होकर वह सुदर्शनसे रति-दानकी प्रार्थना करने लगी। सुदर्शन तो ध्यानमग्न थे। उन्होंने यह उपसर्ग देखा तो प्रतिज्ञा कर ली कि यदि मैं इस उपसर्गसे बच सका तो मुनिदीक्षा ले लूँगा। - रानी कामान्ध होकर नाना भाँतिकी कुचेष्टा करती रही। किन्तु सुदर्शन अपने ध्यान में लीन रहे। रानीने अनुनय विनय को, प्रेम प्रकट किया, शारीरिक कुचेष्टाएँ कीं। जब दृढ़ शील
SR No.090097
Book TitleBharat ke Digambar Jain Tirth Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalbhadra Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year1975
Total Pages370
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Pilgrimage, & History
File Size18 MB
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