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________________ ऊर्ध्व दिशा को छोड़कर शेष नौ दिशाओं में घनोदधि वातवलय से लगी हुई हैं, परन्तु पाठवों पृथ्वा दशों दिशाओं में ही बातवलय को छूती है ।२४। सौधर्म युगल के विमान घनस्वरूप जल' के ऊपर तथा माहेन्द्र व सनत्कुमार कल्प के विमान पवन के ऊपर स्थित हैं।२०६। ब्रह्मादि चार कल्प जल व वायु दोनों के ऊपर, तथा मानत प्राणत आदि शेप विमान सुद्ध आकाश तल में स्थित हैं ।२०७॥ ४. वातवालयों का विस्तार ति. प./१२७०.२८१ जोयणबोससहस्सा वह तम्मारुदाण पत्तेककं । अखिदीणं हेठेलोपतले उवरि जाव इगिरज्जू ।२७०। सगपण चउजोयणयं सत्तमणारयम्मि पुहविषणधीए। पंचच उतियामाणं तिरीयसेत्तस्स पणिधीए ।२७१। सगपंचचउसमाणा पणिधीए होति बम्हकप्पस्स 1 पणच उतिय जोयणया उरिमलोयस तम्मि ।२७२। कोसद्गमेक्ककोस किंचणवक च लोयसिहरम्मि । ऊणपमाणं दंडा च उस्सया पंचवस जुदा ।२७३। तीसं इगिदालदले कोसा तियभाजिदा य उणवणणा । सत्तमखिदिपणिधोए बम्हजुदे बाउबलतं ।२५०।दो छन्नारस भागभहियो कोमो कमेण बाउघर्ण । लोयउवरिम्मि एवं लोय विभायम्मि पण्णत्तं।२८११दष्टि नं० १-आठ पश्चियों के नीचे लोक के तल भाग से एक राज की ऊँचाई तक इन वायु मण्डलों में से प्रत्येक को मोटाई २०,००० योजन प्रमाण है। ।२७०१ सातवें नरक में पक्षियों के पार्श्व भाग में कम से इन तोनों वातबलयों को मोटाई ७, ५ और ४ तथा इसके ऊपर तिर्यग्लोक (मध्यलोक) के पाश्वभाग में ५, ४ और ३ योजन प्रमाण है 1२७१। इसके आगे तोनों वायत्रों की मोटाई ब्रह्म स्वर्ग के पार्व भाग में क्रम से ७,५और ४ योजन प्रमाण, तथा ऊध्वं लोक के अन्त में (पाव भाग में) ५, ४ और ३ योजन प्रमाण है।७। लोक के शिखर पर (गार्व भाग में) उक्त तीनों वातवलयों का बाहल्य क्रमशः २ कोस, १ कोस और कुछ कम १ कोस है। यहां कुछ कम का प्रमाण २४२५ धनुष समझना चाहिये ।२७३। (शिखर पर प्रत्येक की मोटाई २०,००० योजन है दे. मोक्ष ) (त्रि. सा./१२४-१२६) १. दृष्टि नं. २.-सात पृथ्वी और ब्रह्म युगल के पावभाग में तीनों बायों की मोटाई क्रम से ३०, ४१/२ और ४६/३ कोस हैं ।।२८०। लोक शिखर पर तीनों बातबलयों को मोटाई क्रम से १३, ११ और ११ कोस प्रमाण है। ऐसा लोक विभाग में कहा गया है।२८१।१-विशेष दे. चित्र सं १ । ५. लोक के आठ रुचक प्रदेश रा. वा./१/२०/१२/७६/१३ मेरुप्रतिष्ठावचवडूर्यपटलान्तरुचकसस्थिता अष्टावाकाशप्रदेशलोकमध्यम् । --मेरु । इसी क्षेत्र में नप बाहओ का घनफल तीन में गुरिणत और पतीरा से भाजिन लोक प्रमाण तथा यवक्षेत्र का घनफल चौदह से भाजित लोक प्रमाण है। दुष्य क्षेत्र में-३४३-:-१४४७३६ बाह्य बाहुओ का घनफल ३४.५ ६८३ १० बा० का प. फ. ३४३-३:३५-२६१ल. बा० का ध० फ० ३४३ ४ १४ = २४, यव क्षेत्र का प. फ. ७३३.६८+ २६ २४३ =१६६ । रा, अधोलोक सम्बन्धी कुल दूध क्षेत्र का घनफल । एक गिरिकट क्षेत्र का धनकल चौरासी से भाजित लोक प्रमाण है। इसको अड़तालीस से गुणा करने पर कुल गिरिकट क्षेत्र का धनफल होता है । ३४३.८४= ४२५ एक गिरिकट का घ. फ. ४१३४४६. १६६ सम्पूर्ण गिरिकट का प.फ. इस प्रकार आठ भेद रूप इस अधोलोक का वर्णन किया जा चुका है । अत्र वहां से आगे जाउ प्रकार के ऊर्ध्व लोक का निरूपण करते हैं। सामान्य उवलोक का घनफल सात से भाजित और तीन से गुणित लोक के प्रमाण अर्थात् एक सौ सैतालीस राजु मात्र है। ३४१ : ७४३:१४.७ रा. सामान्य अर्व लोक का घनफल । द्वितीय ऊर्वायत चतुरस्र क्षेत्र में वेध और भुजा जग श्रेणी प्रमाण, तथा कोटि तीन राजुमात्र है। ७४७४३-१४७ कु. आयत क्षेत्र का घनफल । तीसरे तिर्यगायत चतुरन्न क्षेत्र में भुजा और कोटि श्रेणी प्रमाण, तथा वेष तीन राजु मात्र है। बहुत में यबो युक्त मुरज क्षेत्र में बह और मरज रूप होता है। इसमें से यव क्षेत्र का घनफल सात से भाजित लोक प्रमाण और मुरज क्षेत्रका घनफल सात रो भाजित और ८०
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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