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________________ पर्वत के नीचे वज व वैड्यं पटलों के बीच में चौकोर संस्थान रूप से अवस्थित प्राकाश के पाठ प्रदेश लोक का मध्य है। ६. लोक विभाग निर्देश ति.प./१/१३६ सयलो एस य लोओ णिपणो सेदिविंदमाणेण । तिवियप्पो णादब्बो हेटिठममझिल्लउडढ भएण। । १३६ । श्रेणी वृन्द के मान से अर्थात् जग श्रेणी के धन प्रमाण से निष्पन्न हुआ यह सम्पूर्ण लोक, अधोलोक, मध्यलोक और कललोक के भेद से तीन प्रकार का है । १३६ । (बा. अ./३६) : (घ. १३/५, ५, ५०/२८८/४) । १७. त्रस व स्थावर लोक निर्देश (पूर्वोक्त वेत्रासन व मृदंगाकार लोक के वह मध्य भाग में, लोक शिखर से लेकर उसके अन्त पर्यन्त १४ राजू लम्बी व मध्य लोक समान एक राजू प्रमाण विस्तार युक्त नाड़ी है । त्रस जीव इस नाड़ी से बाहर नहीं रहते इसलिये यह अस नाली नाम से प्रसिद्ध है। परन्तु स्थाबर जोव इस लोक में सर्वत्र पाये जाते हैं। तहां भी सूक्ष्म जीव तो लोक में सर्वत्र ठसाठस भरे हैं, पर बादर जीव केवल असनाली में होते हैं उनमें भी तेजस्कायिक जीव केवल कर्मभूमियों में ही पाये जाते हैं अथवा अधोलोक व भवनवासियों के विमानों में पांचों कायों के जीव पाये जाते हैं, पर स्वर्गलोकमहीं। ८. अधोलोक सामान्य परिचय (सर्व लोक तीन भागों में विभक्त है-अथो, मध्य व ऊर्ध्व-दे. लोक/२/२ मेरु तल के नीचे का क्षेत्र अधोलोक है, जो वेत्रासन के आकार वाला है। राज ऊंचा व ७ राज मोटा है। नीचे ७ राज व ऊपर राज प्रमाण चौडा से लेकर नीचे तक क्रम से रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्र भा, तमप्रभा व महातमप्रभा नाम की ७ पृथ्वियां लगभग एक राजू अन्तराल से स्थित हैं। प्रत्येक पृथ्वी में यथा योग्य १३, ११ प्रादि पटल १००० योजन अन्तराल से अवस्थित हैं। कल पटल ४६ हैं। प्रत्येक पटल में अनेकों बिल या गुफायें हैं । पटल का मध्यवर्ती बिल इन्द्रक कहलाता है। इसकी चारों दिशामों व विदिशामों में एक घणो में अवस्थित बिल धेणीबद्ध कहलाते हैं और इनके बीच में रत्नराशिवत् विखरे हये बिल प्रकीर्णक कहलाते हैं । इन बिलों में नारको जीव रहते हैं। (दे. नरक/५] । सातों पृथ्वियों के नीचे अन्त में एक राजू प्रमाण क्षेत्र खाली हैं । (उसमें केवल निगोद जीव रहते हैं) -दे, लोक/३/१४ । (विशेष देखो, नरक/५) ६. भावनलोक निर्देश उपरोक्त सात पृथ्वियों में जो रत्नप्रभा नाम को प्रथम पृथ्वी है, वह तीन भागों में विभक्त है-खरभाग, पंकभाग व दो से गुरिणत लोक के प्रमाण है । ७४७४ ३ =१४७ ति. आयात क्षे. का घ. फ. यव मुरज में ३४३ : ७४४६ प.क्षे. घ. फ. ३४३-७४ २ -६८ .क्षे. का . फ. ४६+६=१४७ समस्त य, मु. क्षे. का घ. फ. । पवमध्य क्षेत्र में एक यव का धनफन अठाईस से भाजित लोक प्रमाण है। इसको बारह से गुरषा करने पर सम्पूर्ण यव मध्य क्षेत्र का पतफल निकलता है। ३४३-२८=१२३ एक यव का घ. फ. १२१x१२-१४७ रा. सम्पूर्ण य. म. क्षे. का घ. फ, । मन्दरसदश आकार वाले ऊर्ध्व क्षेत्र में जार-ऊपर ऊंचाई कम से तीन से भाजित दो राजु, तीन से भाजित एक राजु, चार से भाजित तीन राजु और, बारह से भाजित इकतीस राजु, चार से भाजिन तीन राजु और बारह से भाजित तेईस राजु मात्र है। 111111३+ ७ राजु । अट्ठा नवे से विभक्त और तीन से गुरिणत जगणी प्रमाण तटों का विस्तार है । ऐसे वार तटवर्ती करणाकार खण्डित क्षेत्र से चूलिका होती है। प्रत्येक तट का विस्तार- ४३-11--राजु । उस चूलिका की भूमि का विस्तार तील तटों के प्रमाण, मुख का विस्तार इसका तीसरा भाग, तथा ऊंचाई चार से भाजित और तीन से गुणित राजु मात्र है।
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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