SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 89
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ निकला हुआ जीव सम्यग्दर्शन की शुद्धता से तीर्थकर पद प्राप्त कर सकता है। नरकों से निकले हुए जीव बलभद्र, नारायण और चक्रवती पद छोड़कर ही मनुष्य पर्याय प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् मनुष्य तो होते हैं पर बलभद्र नारायण ओर चक्रवर्ती नहीं हो सकते । गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक इस प्रकार मैंने संक्षेप से तेरे लिए अधोलोक के विभाग का वर्णन किया । अब तू तिर्यग्लोक-मध्यम लोक के विभाग का वर्णन सुन । बुद्धिमान मनुष्य सब समय, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले, जिनेन्द्र भगवान के बचन रूपी उत्तम दीपकों की सामर्थ्य रो सूर्य और चन्द्रमा के अगोचर अधोलोक के अन्धकार को नष्ट कर वस्तु के यथार्थ स्वरूप को देखते हुए प्रभुत्व को प्राप्त होते हैं इसमें क्या पाश्चर्य है ? क्योंकि तीन लोक में जिनेन्द्र रूपी सूर्य के द्वारा प्रकाश के उत्पन्न होने पर अन्धकार का सद्भाव कहाँ रह सकता है? ४. वातवलयों का परिचय १. वातवलय सामान्य परिचय ति. प./१/२६८ गोमुत्तमुग्गवणा घणोदधी तह धणाणिलो वाऊ। तणुवादो बहुवण्णोरुक्खस्य तयं ब बलयतियं 1२६८=गोमुत्र के समान वर्णवाला घनोदधि, मूग के समान वर्णवाला बनवात तथा अनेक वर्णवाला ननुवात । इस प्रकार व तीनों वातवलय वृक्ष की त्वचा के समान (लोक को घेरे हये) हैं।२६८। (रा. वा. /३/१/८/१६०/१६) : (चि. सा./१२३) : २. तीन वातवलयों का सबस्थान क्रम ति. प./१/२६६ पढमो लोयाधारो घणोबही इह घणाणिलो तत्तो। तत्परदो तणुवादो अंतम्मि णहं णिवाधारं ।२६६। =इनमें से प्रथम घनोवधि वातवलय लोक का आधार भूत है, इसके पश्चात् धनवातवलय, उसके पश्चात् तनुबातवलय और फिर अन्त में निजाधार आकाश है ।२६९। (स. सि./३/१/२०४३) : (रा. वा./३/१/८/१६०/१४) : (तत्वार्थ वृत्ति/३/१/ श्लो. १-२/११२) । तत्वार्थ वत्ति /३/१/१११/१६ सर्वाः सप्तापि भूमयो घनवातप्रतिष्ठा वर्तन्ते । स च धनवात: अम्बुवातः प्रतिष्ठोऽस्ति । स चाम्बुवातस्तनुवातस्तनप्रतिष्ठो वर्तते । स च तनुवातः प्राकाश प्रतिष्ठो भवति । आकाशस्यालम्बनं किमपि नास्ति । =ष्टि नं. २. ये सभी सातों भूमियां धनवात के पाश्रय स्थित हैं। वह घनवात भी अम्बू (धनोदधि) वात के आश्रय स्थित है और वह अम्बुवात तनुवात के पाश्रय स्थित है। वह तनुवात आकाश के प्राश्रय स्थित है, तथा प्रकाश का कोई भी आलम्बन नहीं है। ३. पृथ्वियों के साथ वातवलयों का स्पर्श ति.प./२/२४ सत्तच्चिय भूमीग्रो णवदिसभाएण घणोवहिविलग्मा । अट्ठमभूमीवसदिस भागे घणोवहिं छिवदि।२४| ति.प.८/२०६-२०७ सोहम्मदुगबिमाणा घणस्सस्वस्स उबरि सलिलस्स चेतेपवणोवरि माहिन्द सणकूमाराणि ।२०६। बम्हाई चत्तारो कप्पा चेद्वति सलिलवादूळ पाणदपाणदपहुदो सेसा सुद्धम्भि गयणयले ।२०७४ - सातों (नरक) पृथ्वियाँ अट्ठागबे, बानब, नवासी, न्वासी, उनतालीस, बत्तीस और चौदह, ये कम से उक्त सात स्थानों में सात गुणकार हैं। पूर्वोक्त ऊंचाई क्रम से विस्तार का प्रमाण-४६८; १४६२१४८९; TEX८२१८४३६८४३२१४१४ । नीचे से ऊपर सात स्थानों में धनराजु को रखकर घनफल जानने के लिये गुणकार को कहता हूँ। उक्त सात स्थानों में पंचान, एक सौ इक्यासी, दो सौ सतासी, पांच हजार दो सौ तीन, अट्ठाईस, उनहत्तर और उनचास, ये सात गुणकार, तथा चार, चार का वर्ग (१६), बारह, अड़तालीस, तीन, चार और चौवीस, ये सात भागहार है। पूर्वोक्त ऊंचाई के क्रम से घनफल का प्रमाण Sx+4+8+५११३-२+ + १६६ रा० द्रुष्व क्षेत्र में चौदह से भाजित और तीन से गुणित लोक प्रमाण बाह्य उभय वाहओं का और पाँच से विभक्त लोक प्रमाण आभ्यन्तर दोनों बाहुओं का धनकल है।
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy