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________________ भ्रन्तर से जन मान्य स्वो के प्रथम "ऋतु' माभक पटल का अबस्थान ८. देवों में कुछ का मैथुन से और कुछ का स्पर्श या अवलोकन मादि से काम भोग का सेवन तथा ऊपर के स्वर्गों में कामभोग का अभाव जैनमान्यतावत् हो है। (दे० देव ।।१।१०) ६. देवों का ऊपर-ऊपर अवस्थान । १०. मनुष्यों की ऊँचाई से लेकर देवों के शरीरों की ऊँचाई तक ऋमिक वृद्धि लगभग जैन मान्यता के अनुसार है। (दे० अवगाहना) । ३-आधुनिक भूगोल के साथ यद्यपि जैन भूगोल स्थूल दृष्टि से देखने पर मेल नहीं खाता पर प्राचार्यों की सुदूरवर्ती सूक्ष्मदृष्टि व उनकी सूत्रात्मक कथन पद्धति को ध्यान में रखकर विचारा जाये तो वह भी बहुत प्रशों में मिलता प्रतीत होता है। यहाँ यह बात अवश्य ध्यान में रखने योग्य है कि वैज्ञानिक जनों के अनुमान का आधार पृथ्वी का कूछ करोड वर्ष मात्र पूर्व का इतिहास है। जबकि प्राचार्यों की दृष्टि कल्पों पूर्व के इतिहास को स्पर्श करती है। जैसे कि१. पृथ्वी के लिये पहले अग्नि का गोला होने की कल्पना उसका धीरे-धीरे ठण्डा होना और नये सिरे से उस पर जीवों व मनुष्यों की उत्पत्ति का विकास लगभग जनमान्य प्रलय के स्वरूप से मेल खाता है (दे० प्रलय) । २. पृथ्वी के चारों ओर के वायुमण्डल में ५०० मील तक उत्तरोत्तर तरलता जैन मान्य तीन वातावलयोंबत ही है। ३. एशिया आदि महाद्वीप जैन मान्य भरतादि क्षेत्रों के साथ काफी यज्ञ में मिलते हैं (दे० प्रगला शीर्षक) ४. आर्य ब म्लेच्छ जातियों का यथायोग्य अवस्थान भी जैन मान्यता को सर्वथा उल्लंघन करने को समर्थ नहीं। ५. सर्य-चन्द्र आदि के प्रवस्थान में तथा उन पर जीव राशि सम्बन्धी विचार में अवश्य दोनों मान्यताओं में भेद हैं। तहाँ भी सूर्य-चन्द्र मादि में जीवों का सर्वथा अभाव मानना वैज्ञानिकों की अल्पज्ञता का भी द्योतक है, क्योंकि वहाँ रहने वाले जैन मान्य वैक्रियिक शरीरधारी जीव विशेषों को उनकी स्थूल दृष्टि यन्त्रों द्वारा भी स्पर्श करने को समर्थ नहीं है। समझना चाहिये । और लोक प्रमाण को चार से गुणा कर उसमें सात का भाग देने पर जो लब्ध आवे उतना अस नाली से युक्त पूर्ण अधोलोक का वनफल समझना चाहिये ।। १६ ॥ ३४३४२७-४६=१८६ सनाली छोड़ शेष अ. लो. काप. क. ३४३४४ =१९६ पूर्ण ब.लो. का घनफल । मृदंग के आकार का जो सम्पूर्ण ऊर्ध्वलोक है उसे देदकर मिला देने पर पूर्व पश्चिम से वेत्रासन के सदृश अपोलोक का आकार बन आता है ।। १६६॥ ऊर्ध्व नोक के मुख का व्यास जगणी का सातवा भाग है और इरासे पाँचगुणा (५ राजु) उसकी भूमि का ध्यास तथा ऊंचाई एफ जमश्नरणी है ।। १७०॥ रा.१ । ५। ७ । लोक को तीन से गुणा करके उसमें सात का भाग देने पर जो लब्ध आत्रे उतना ऊध्र्वलोक का बनफल है और लोक को तीन से गणा करके उसमें चौदह का भाग देने पर लब्धराशि प्रमाण ऊर्व लोक सम्बन्धी आधे क्षेत्र का फल (घनफल) होता है ।। १७१ ॥ ३४३४३:७=१४७ ऊ. लो. घ. फ. ३४३४३:१४=७३३ अई ऊ. लो. घ. फ. अचलोक से अस नाली को छेदकर और उसे अलग रखकर उसका घनपाल निकाले । इस बनफल का प्रमाग उनपास से विभक्त लोक के बराबर होगा ।। १७२ ॥ ३४३:४६७ अ. लो. त्र. ना. घ. फ. लोक को बीस से गूणा करके उसमें उनचास का भाग देने पर बसनाली को छोड़ बाफी अवलोक का घनफल निकल याता है। लोक को तिगृणा कर उसमें सात का भाग देने पर जो लब्ध आवे उतना वसनाली युक्त पूरणं ऊर्ध्वलोक का घनफल है।। १७३ ॥ ३४३४२०-४९=१४० असनाली से रहित क. लो. का ध, फ. ३४३४३:७=१४७ असनाली युक्त ऊ. लो. का घनफल अवलोक मौर अधोलोक के घनफल को मिला देने पर वह धेशी के बनप्रमाण (लोक) होता है । अब विस्तार में अनुराग ५२
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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