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________________ यह कर्म अन्यावाधगुण को घात करता है। इसमें सत्ता असाता वेदनीय ऐसे दो भेद हैं। विषय को ग्रनुकूल करने वाले को माता कहते हैं। विषय सुख को अथवा दुःख को उत्पन्न करने को असाता कहते हैं। ४- मोहनीय कर्म आत्मा के दर्शन और चारिष गुण को हनन करने वाले कर्म को मोहनीय कर्म कहते हैं। जिससे सम्यग्दर्शन प्रगट करने में अटकता है । उसको दर्शन मोहनीय कहते हैं। सम्यग्वारित्र की बात करने वाले को चारित्र मोहनीय कहते हैं । ५ - दर्शन मोहनीय- इसमें मिथ्यात्व इसका उदय जब होता है जीव को अयोग्य के प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर देता है । सम्यकत्व मिथ्यात्व जब उसका उदय होता है तो जीव के परिणाम को उत्पन्न कर देता है । उस समय उसके परिणाम को सम्यके सम्यदर्शन होने वाले कर्म को धनाकर्मकहते हैं। ६ मान माया लोभ इनसे ७ – धावक के १२ व्रत के पालने में विधन डालना आत्मा के देश चारित्र को नाश करने वाले कषाय को अप्रत्याख्यान कहते हैं। ८ नियम व्रत पाने में राय को प्रत्याख्यान कहते हैं। --चार पूर्ण करने में दिवालने वाले कपाको संयम कहते हैं। 10-Ayuh, the force which determines the duration of the association of the soul with. its Physical body. 11- Namd, or the Group of forces which organize the body and its limbs. स्पर्श वर्ण ५ – काला, नीला, लाल, पीला, हरा । षट् रस -- खठ्ठा, मीठा, नमकीन, कड़वा, चरपरा, कषायला । | चार आनुपूर्व नरक, लीच, मनुष्य देव कु P. XXXIX. Sri C. R. Jain, H. H. D. L. २ - गति ४, नरक, तियंच, मनुष्य और देव । जाति पाँच औदारिक, वैदिक, आहारक, वेदिक, अंगोपांग कार्मारण कुल मे (४+४+४+३ = १७) निर्मारण कर्म अगोपांग की रचना करता है। बंधन कर्म पाँच प्रकार के हैं- औदारिक वैकियिक अंगोपांग की रचना करता है । आहारक जर कारण ये शरीर का को जुड़ा देता है। संघात चोदारिक कार्माण वे शरीर को रहित रखते हैं। संस्थान कर्म ६ मयचतुरख ग्योप्रोप परिमण्डल, स्वाति, कुक, वामन, शरीर के आहार को और ऊंचाई को विभाजित कर देता है। संहनन वृषभानाच बखगाराच अर्द्धनाराय, कीसक, असम्पाटिका ये ही के बन्धन कार्य को ठीक कर देता है। कुल ये (१७+१+५१-५+६ |- ६=४०) कठोर, कोमल, इस्का, भारी, ठण्डा, गर्म, स्निग्धा । मिलकर (४०+४+६+४६२) P. XXXIX Sri C. R. Jain, H. H. D. I. १६ अगुरुलघु उपघात परघात आतप चार योग पति होती है । = मनोज्ञ अमनोज्ञ उत्छवास बस स्थावर बादर सूक्ष्म पर्याप्त अपर्याप्त प्रत्मय साधर्म स्थिर अस्थिर शुभ अशुभ शुभ अशुभग सुस्बर दुस्वर प्रायस कीर्ति अवशकीर्ति टीकर दो नन्दुर्गन्ध कुल ६२-२०१३) यहाँ हर कर्म के मांगे नाम कर्म ऐसा समझ लेना चाहिए। अनुपूर्वी नाम कर्म का अर्थ मरणान्तर अथवा पुनर्भव मे आने के पहले अर्थात् विग्रह गति में मरण करने के पहले रहने वाले शरीर आकार के आत्म प्रवेश को रखने वाले कर्म - योग विहायो गति नाम कर्म – यह कर्म आकाश में संचार करने की शक्ति उत्पन्न करा देता है । तीर्थंकर नामकर्म – इस कर्म से जीव को अर्हन्त पद प्राप्त होता है ।
SR No.090094
Book TitleBhagavana Mahavira aur unka Tattvadarshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1014
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, Principle, & Sermon
File Size36 MB
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