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चन्द्र
सीता
यश
यशस्वी(सीता)
करना
करना
सुदर्शन
भदा
उत्तर
विजय
स्फटिक
अलभूषा मिश्रकेशी
अलंभूषा मिथकेशी
वैजयन्त
अंक
जयन्त
पुण्डरी किणी
अंजन
पुण्धरीकणी वारुणी
अपराजित
वारुणी
कांचन
कुण्डलक
प्राशा
रजत
अाशा
जन्म कल्याणक पर चंवर धारण करना !
जन्म कल्याणक पर चंबर धारण करना ।
रुचक
कुण्डल
रुचिर (रुचक)
रत्नकुट सर्वरल
सुदर्शन
!
ति
ति. प..
ति.प.
त्रि. सा.
दिशा
देवियों
का काम
देवियों
का काम
कट
देवी
उपरोक्त की । १ ।
कनका
विमल नित्यालोक
अभ्यन्तर
शतपद
दिशाएं निर्मल करना
दिशाओं में
स्वयंप्रभ
(शतहृदा) कनक चित्रा सौदामिनी
नित्योद्योत
उपरोक्त की
१
।
रुचक
रुचककीति
अभ्यन्तर
मणि
रुचककान्ता
जात कर्म करना ।
दिशाओं में
राज्योत्तम रुककप्रभा वैडूर्य
रुचका
- -. -.-.- -. . चतुर्य पृथ्वी में तार नामक तृतीय इन्द्रक का विस्तार बारह लाख इक्यानवे हजार छह सौ छयासठ योजन और एक योजन के तीन भागों में से दो माग प्रमाण है।
१३६३३३३-६१६६६=१२६१६६३। सर्वशदेव ने चतुर्थ पृथ्वी में तत्व (चर्चा) नामक चतृ इन्द्रक का विस्तार वारह लाख योजन-प्रमाण बतलाया है। १२६१६६६३-६१६६६६१-१२०००००1