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________________ १८ बाई अजीतमति एवं उसके समकालीन कवि दुजरा देहू मेहू सम जातो, नह वाक्यो जमाख्यो मंडाड्यो । घखाप्यु प्रापरणों पण ए किम नोहिए ।। ३२॥ लोभरणी कुडी छितारी गोरडी, मलमूत्रादिक असूचीनी तुररी। पडीयो पासि कुण्ण भवतरिए ॥३३॥ पंच प्रकार प्राश्रव सत्तावन, मलि पावन में करि अपायन । धन्य ते जे एथी बेगुल ए ॥३४॥ प्राधवरोधन करय महंत. गुपति बोषय जम यति गुणवंत । संतते संवर प्रादरिए ॥३५॥ तप करी कर्म करें ये जर्जर, उभय प्रकारि करय जे नीजर । निर्जर यई मोक्ष ते लहिए ॥३५।। घन रज्जू त्रयसि त्रिताल, पुरुषाकारि लोक विशाल । मनादि अनंत द्रव्यिं भरभु, ए ।। ३७।। प्रार्ज खंड मनुज उत्तम कुल, दुर्लभ समकित जिन धर्म नीमल । निश्चल पालि ते धन धन एह ।।३।। त्रिकरण सूध करि दस धर्म, सास तस्वनु आणि मर्म । कमहणी सिव ते लहिए ॥३६॥ एणी पिरि चितवता मनुप्रेक्षा, बसोपराय मझ देवि सीक्षा। दीक्षा लेवा उद्यम करिए ।।४।। राय सहू सूक्षमतम कीष, माथि एक सत नुप छि प्रसीष । लीध दीक्षा दान पूजां करीए ॥४१॥
SR No.090071
Book TitleBai Ajitmati aur Uske Samkalin Kavi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal
PublisherMahavir Granth Academy Jaipur
Publication Year1984
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Biography
File Size5 MB
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