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बाई अजीतमति एवं उसके समकालीन कवि
दुजरा देहू मेहू सम जातो, नह वाक्यो जमाख्यो मंडाड्यो । घखाप्यु प्रापरणों पण ए किम नोहिए ।। ३२॥
लोभरणी कुडी छितारी गोरडी, मलमूत्रादिक असूचीनी तुररी। पडीयो पासि कुण्ण भवतरिए ॥३३॥
पंच प्रकार प्राश्रव सत्तावन, मलि पावन में करि अपायन । धन्य ते जे एथी बेगुल ए ॥३४॥
प्राधवरोधन करय महंत. गुपति बोषय जम यति गुणवंत ।
संतते संवर प्रादरिए ॥३५॥ तप करी कर्म करें ये जर्जर, उभय प्रकारि करय जे नीजर । निर्जर यई मोक्ष ते लहिए ॥३५।।
घन रज्जू त्रयसि त्रिताल, पुरुषाकारि लोक विशाल ।
मनादि अनंत द्रव्यिं भरभु, ए ।। ३७।। प्रार्ज खंड मनुज उत्तम कुल, दुर्लभ समकित जिन धर्म नीमल । निश्चल पालि ते धन धन एह ।।३।।
त्रिकरण सूध करि दस धर्म, सास तस्वनु आणि मर्म ।
कमहणी सिव ते लहिए ॥३६॥ एणी पिरि चितवता मनुप्रेक्षा, बसोपराय मझ देवि सीक्षा। दीक्षा लेवा उद्यम करिए ।।४।। राय सहू सूक्षमतम कीष, माथि एक सत नुप छि प्रसीष । लीध दीक्षा दान पूजां करीए ॥४१॥