SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 95
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आत्मानुशासनम् बलवान् ब्रह्मचारी, धैर्यशाली, श्रद्धालु, जितेन्द्रिय एवं दानादि धर्मकार्यो मे तत्पर होना चाहिये । साथ ही उसका औषधिमें अनुराग भी होना चाहिये १ । रसायन प्रारम्भ करानेके पूर्व में हरीतकी ( हरड ) आदिके विरेचनद्वारा मलस्थितिके अनुसार तीन, पांच अथवा सात दिन तक उसको कोष्ठशुद्धि कराना चाहिये तत्पश्चात् प्रारम्भ कराना चाहिये | रसायनका अर्थ होता है श्रेष्ठ रस- रुधिरादिककी प्राप्तिका उपाय | इस रसायन के उपयोगसे मनुष्यको दीर्घ आयु, स्मृति, मेघा, आरोग्य, तारुण्य एवं तेज आदिकी प्राप्ति होती है२ । ९४ 1 प्रकृत रसायनोंमें अनेक प्रकारके लेह आदि योगोंकी विधि, उनके उपयोग और उससे प्राप्त होनेवाले फलका पृथक् पृथक् विवेचन आयुर्वेद ग्रन्थोंमें उपलब्ध होता है ३ । श्लोक १८३ में मोंहको व्रणके समान बतलाकर यह कहा गया है। कि जिस प्रकार पुराना, शनि आदि गहके दोष से उत्पन्न, गहरा, गतियुक्तशरीर के भीतर जाकर फैलनेवाला और सरुज् ४ ( पीडाप्रद ) फोडा जात्यादि १. रसायनानां द्विविधं प्रयोगमृषयो विदुः । कुटीप्रावेशिकं मुख्यं वातात पिकमन्यथा ॥ निर्वाते निर्भये हर्म्ये प्राप्योपकरणे पुरे । दिश्युदीच्यां । शुभे देशे त्रिगर्भा सूक्ष्मलोचनाम् ॥ धूमातप- रजोव्यालस्त्री मूर्खाद्यविलङ्घिताम् । सज्जवैद्योपकरणां सुमृष्टां कारयेत् कुटी ॥ अथ पुण्येहि संपूज्य पूज्यांस्तां प्रविशेच्छुचिः । तत्र संशोधनैः शुद्धः सुखी जातवलः पुनः ॥ ब्रह्मचारी धृतियुतः श्रद्दधानो जितेन्द्रियः दान. शील- दयासत्य- व्रत- धर्मपरायणः ॥ देवतानुस्मृतौ युक्तो युक्तस्वप्न- प्रजागरः । प्रियौषधः पेशलबाक् प्रारभेत रसायनम् ।। अष्टाङ्गहृदय ३९, ५-१०. २. दीर्घमायुः स्मृति मेघमारोग्यं तरुणं वयः । प्रभा- वर्ण-स्वरौदायं देहेन्द्रियबलोदयम् ।। वासिद्धि कृषतां कान्तिमवाप्नोति रसायनात् । लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥ अ.हृ. ३९, १-२. ३. इन रसायनोंका वर्णन वाग्भटविरचित अष्टाङ्गहृदय ( अ. ३९ ) में श्लोक १५-१४४ में पाया जाता है। -- ४. सरुज् व्रणका स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया हैश्यामं सशोफं पिटिकान्वितं च मुहुर्मुहुः शोणितबाहितं च । मृद्गतं बुद्बुदृतुल्यमासं व्रणं सशल्यं सरुजं वदन्ति ॥ योगरत्नाकर २, पृ. २९६.
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy