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आत्मानुशासनम्
परिणामोंसे संयुक्त होनेके कारण नवीन कर्मबन्धको करता है, उससे नरकादि गतियोंमें गमन होता है, गतिको प्राप्त हुए जीवके शरीर होता है, शरीरमें सम्बद्ध इन्द्रियां होती हैं, उनके द्वारा विषयग्रहण होता है, और उससे फिर राग एवं द्वेष भाव उत्पन्न होता है। इस प्रकारसे गाडीके पहियेके समान संसाररूप समुद्रमें परिभ्रमण करनेवाले संसारी जीवकी अवस्था है । उक्त संसारपरिभ्रमण अभव्य जीवका अनादिअनिधन तथा भव्य जीवका अनादि-सान्त होता है, ऐमा जिनेन्द्र देवके द्वारा कहा गया है। ___श्लोक २१७ में बाहुबलीका उदाहरण देकर यह बतलाया गया है कि भरतके द्वारा छोडा गया चक्र जब उनका घात न करके उन्हींकी दाहिनी भुजामें आकर स्थित हो गया तब उन्होंने विरक्त होते हुए उस चक्र-रत्नसे मोह छोडकर उसी समय दीक्षा ग्रहण कर ली थी। उन्हें यद्यपि उसी समय मुक्त हो जाना चाहिये था, पर वे मुक्त न होकर चिर काल तक क्लेशको प्राप्त हुए हैं । सो ठीक भी है-थोडा-सा भी मान महती हानिको किया करता है । ___ उक्त बाहुबलीका उदाहरण कुन्दकुन्दाचार्यने भावप्राभृत (गा.४४) में इस प्रकार दिया है ?--
देहादिचत्तसंगो माणकसाएण कलुसिओ धीर।
अत्तावणेण जादो बाहुबली कित्तियं कालं ॥ अर्थात् शरीरको आदि लेकर समस्त परिग्रहका त्याग करके भी मान कषायसे कलुषित रहनेके कारण बाहुबलीको कितने ही काल आतापनयोगसे स्थित रहने पडा-कायोत्सर्गके स्थित होते हुए भी उन्हें एक वर्ष तक मुक्ति प्राप्त नहीं हुई।
श्लोक ९९ में गर्भ और जन्मके दुखको दिखलाते हुए बतलाया है कि प्राणी माताके उदररूप विष्ठागृहमें स्थित रहकर भूख-प्याससे
१. इस गाथाको टोकामें श्री श्रुतसागर सूरिने आत्मानुशासनके इस (उपर्युक्त) श्लोकको 'तथा चोक्तं' कहकर उद्धृत भी किया है ।