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________________ २४६ आत्मानुशासनम् जिनसेनाचार्यपादस्मरणाधीनचेतसाम् । गुणभद्रभवन्तानां कृतिरात्मानुशासनम् ॥ २६९॥ [ श्लो० २६९ मात्मीयनामकरणं कुर्वाणो जिनसेनाचार्येत्याद्याह-- भदन्तानां पूज्यानाम् || २६९॥ मोक्षोपायमनल्पपुण्यममलज्ञानोदयं निर्मलं भव्यार्थं परमं प्रभेन्दुकृतिना व्यक्तैः प्रसन्नः पवैः । व्याख्यानं वरमात्मशासनमिदं व्यामोहविच्छेदत: सूक्तार्थेषु कृतादरैर हरहश्चेतस्यलं चिन्त्यताम् ॥ ।। इति श्रीपण्डितप्रभाचन्द्रविरचितात्मानुशासनटीका समाप्ता ॥ आचार्यस्वरूप जो गणधर देव हैं उनके चरणोंके स्मरण में चित्तको लगानेबाले एवं कल्याणकारी अनेक गुणोंसे संयुक्त ऐसे पूज्य आचार्योंकी यहआत्मस्वरूपके विषय में शिक्षा देनेवाली कृति ( रचना ) है । दूसरा अर्थ - श्री जिनसेनाचार्य के चरणोंके स्मरणमें चित्तको अर्पित करनेवाले गुणभद्रायह आत्मानुशासन नामक कृति है- ग्रन्थ रचना है ॥ २६९ ॥ समाप्त
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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