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________________ १९२ आत्मानुशासनम् [श्लो० २०३ मूतं सदाशुचि विचेतनमन्यदत्र कि वा न दूषयति धिग्धिगिदं शरीरम् ॥२०२॥ हा हतोऽसि तरां जन्तो येनास्मिस्तव सांप्रतम् । ज्ञानं कायाशुचिज्ञानं तत्त्यागः किल साहसम् ॥२०३॥ अशचीकृत: असि तच्छ रीरं मूर्त सदा अशुचि विचेतनं सत् । अत्र संसारे । अन्यत् कुकुमकर्पूरादि किं ना दूषयति । अपि तु दूषयति अशुचीकरोत्येव । अतो धिक् ॥२०२।। अतिशयेन निन्द्यमिदं शरीरम्, तत्र अनिन्द्यत (त्व) बुद्धया त्वं नष्टोऽसीस्याह--हेत्यादि । हा कष्टम् । हतोऽसि तराम् अतिशयेन नष्टोऽसि । येन कारणेन । अस्मिन् शरीरे । सांप्रतम् इदानीम् । उक्तशरीररूपावगमे तव युक्तं ज्ञानं प्रमाणम् । किंविशिष्टम् । कायाशुचिज्ञानं काय: अशुचिरिति ज्ञानं परिच्छि - त्तिर्यत्र तत्त्यागस्तस्य ज्ञानस्य त्यागः कार्य: (कायः) शुचिरिति विपरीतज्ञानम् । किल अहो । साहसम् अत्यद्भुतं कर्म । अथ वा हतोऽसि कदर्थोतोऽसि । येन शरीरेण । अस्मिन् संसारे । सांप्रतं तब ज्ञान युक्तम् । कयंभूतम् । कायाशुचिज्ञानम् । एतच्च न साहसम् । तत्त्यागस्तस्य शरीरस्य त्यागः किल साहसम् ।। २०३ ।। यहां कौन-सी पवित्र वस्तु (गन्ध विलेपनादि) को मलिन नहीं करता है ? अर्थात् सबको ही वह मलिन करता है । इसलिये ऐसे इस शरीर को वार बार धिक्कार है ॥२०२॥ हे प्राणी ! तू चूंकि इस शरीरके विषयमें अतिशय दुखी हुआ है इसीलिये उस शरीरके सम्बन्धमें जो तुझे इस समय अपवित्रताका ज्ञान हुआ है वह योग्य है। अब उस शरीरका परित्याग करना,यह तेरा अतिशय साहस होगा। विशेषार्थ-अभिप्राय यह है कि जो शरीर अत्यन्त अपवित्र है उसे पवित्र मानकर यह अज्ञानी प्राणी अब तक दुखी रहा है । इसलिये उसका कर्तव्य है कि उक्त शरीरके विषयमें प्रथम तो वह 'यह अपवित्र है' ऐसे सम्यग्ज्ञानको प्राप्त करे और तत्पश्चात् उसे साहसपूर्वक छोडनेका प्रयत्न करे । इस प्रकारसे वह शरीरके निमित्तसे जो दुख सह रहा था उससे छुटकारा पा जावेगा ॥२०३।। साधु अतिशय वृद्धिको प्राप्त हुए भी रोगादिकोंके 1 ज कर्पूरादिकं न ।
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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