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________________ १४४ [ क्लो० १५१ आत्मानुशासनम् प्राप्तागमार्थं तव सन्ति गुणा: कलत्रमत्रार्थ्यवृत्तिरसि यासि वृथैव याञ्चाम् ॥ १५१ ॥ परमाणोः परं नाल्पं नभसो न महत्परम् । इति ब्रुवन् किमद्राक्षीनेनौ दीनाभिमानिनौ ॥ १५२ ॥ संव्यानम् उत्तरीयं वस्त्रम् । हे प्राप्तागमार्थ । अनावृत्तिः न विद्यते प्रार्थी प्रार्थनीये वृत्तिरस्येति अत्रावृत्तिः । असि भवसि त्वम् ।। १५१ ।। अनेन प्रकारेण यो हिमाञ्चां करोति स लघुर्यस्तु न करोति सोऽतिगुरुरिति दर्शयन्नाह - परमाणोरित्यादि । तेरे पास स्वाभाविक हैं । यथा - मनुष्य दूसरोंसे अर्थ (धन) की याचना करता है, सो तेरे लिये आगमका अर्थ (रहस्य) प्राप्त है ही । यह उस लौकिक छानसे अधिक कल्याणकारी है । इसके अतिरिक्त तुझे रहने के लिये गुफायें विद्यमान हैं, अतएव घरकी याचना करनेकी आवश्यकता नहीं रहती । दिशायें ही तेरे लिये वस्त्र हैं। लौकिक वस्त्र तो चिन्ताका कारण है, अतएव उसको छोडकर दिगम्बर रह और निश्चिन्त होकर तपकी वृद्धि कर | यह तपकी वृद्धि तेरे अभीष्ट भोजनका काम करेगी । स्त्री के स्थान में तेरे पास उत्तमक्षमा आदि गुण विद्यमान हैं, तू इनसे अधिक से अधिक अनुराग कर। इस प्रकार तेरे पास सब आवश्यक सामग्री विद्यमान है, अतएव दीन बनकर व्यर्थ में किसीसे याचना मत कर । याचना करनेसे मनुष्य श्रीहीन होकर निर्लज्ज बन जाता है, उसकी बुद्धि और धैर्य नष्ट हो जाता है, तथा अपयत बढता है । किसी ने यह ठीक कहा है - देहीति वचनं श्रुत्वा देहस्थाः पञ्चदेवताः । मुखान्निर्गत्य गच्छन्ति श्री ही धी- धृति कीर्तयः ॥ अर्थात् ' देहि (मुझे कुछ दो ) ' इस वचनको सुनकर शोभा, लज्जा, बुद्धि, धैर्य और कीर्ति ये शरीररूप भवनमें रहनेवाले पांच देवता 'देहि' इस वचन के साथ ही मुखसे निकल कर चले जाते हैं । अतएव ऐसी याचनाका परित्याग करना ही योग्य है ।। १५१ ।। परमाणुसे दूसरा कोई छोटा नहीं है और आकाशसे दूसरा कोई बडा नहीं है, ऐसा
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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