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आत्मानुशासनम्
[श्लो० ७०
अवश्यं नश्वररेभिरायुःकायादिभिर्यदि । शाश्वतं पदमायाति मुधायातमवैहि ते ॥७॥ गन्तुमुच्छ्वासनिःश्वासैरभ्यस्यत्येव संततम् । लोकः पृथग (गि)तो वाञ्छत्यात्मानमजरामरम् ॥७॥ मलत्यायुः प्रायः प्रकटितवटीयन्त्रसलिलं खलः कायोऽप्यायुगतिमनुपतत्येव सततम् ।
आबन्धः ॥६९॥ तस्मात् आह- अवश्यमित्यादि । शाश्वतं पदं मोक्षस्थानम् ॥७॥ तत्र आयुषो नश्वरत्वं दर्शयन् 'गन्तुमित्यादि ' श्लोकद्वयमाह- संततं एष जीवोऽभ्यस्यति । किं कर्तुम् । गन्तुं शरीरं त्यक्तुम् । कैरभ्यस्यति । उच्छ्वासनि: श्वास: । लोकः पृयक् पृथक् लोकः अविवेकिजनः । इतः एभ्य: उच्छ्वासनिः श्वासेभ्यः ।आयुष: अपकर्षोपायेभ्यः। आत्मानम् अजरामरं मृत्योरगोचरं वाञ्छति । अथवा पूरककुम्भकरेचकरूपेभ्य: उच्छवासनिःश्वासेभ्यः आत्मानम् अजरामरं वृद्धलमृत्युरहितं वाञ्छति । पूरको हि उच्छ्वासो रेचको निःश्वास इति ॥७॥ गलतीत्यादि । गलति गच्छति आयुः । प्राय: अत्यर्थम् । प्रकटितम् अनुकृतं घटीयन्त्र
नहीं की जा सकती है तब हपूर्वक सब प्रकारसे उसकी रक्षाका प्रयत्न करना निरर्थक है ॥६९। इसलिये यदि अवश्य नष्ट होनेवाले इन आयु
और शरीर आदिकोंके द्वारा तुझे अविनश्वर पद (मोक्ष) प्राप्त होता है तो तू उसे अनायास ही आया समझ ॥७०॥ यह जीव निरंतर उच्छवास और निःश्वासोंके द्वारा जानेका अभ्यास करता है। परंतु अज्ञानो जन उन उच्छ्वास और निःश्वासोंके द्वारा आत्माको अजर-अमर अर्थात् जरा और मरणसे रहित मानता है ॥ विशेषार्य-अभिप्राय यह है कि जिस क्रमसे प्राणीके उच्छ्वास और निःश्वास निकलते हैं उसी क्रमसे उसकी पूर्वबद्ध आयु (जीवित)कम होती जाती है। फिर भी बहुतसे प्राणी अज्ञानतावश यह समझते हैं कि उन उच्छ्वास-निःश्वासोंको जितना अधिक रोका जा सकेगा उतनी ही अधिक आयु बढेगी तथा इस प्रकारसे प्राणी वृद्धत्वसे भी रहित होगा । यह उनका मानना अज्ञानतासे परिपूर्ण है, यही यहां सूचित किया गया है ॥७१॥ यह आयु प्रायः अरहटकी