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________________ ४७ आत्मानुशासनम् ...... श्लो० ४१ सर्व धर्ममयं क्वचित्क्वचिदपि प्रायेण पापात्मकं क्वाप्येतद्वयवत्करोति चरितं प्रजानानामपि । सर्वमित्यादि । गेहाश्रमः कर्ता । चरितं कर्म । करोति । कथंभूतं. चरितम् । सर्व धर्ममयं क्वचित् सामायिकांद्यवस्थायां सर्व चरितं धर्म: प्रकृतो यत्र । क्वचिदकि क्वापि कृष्यादौ । प्रायेण बाहुल्येन । पापात्मकं पापरूपम् । क्वापि प्रासादादिकरणे एतत् चरितं द्वयवत् पुण्यफाफात्मकम् । प्रज्ञानानामपि विवेकिनामपि । तत् ( यत् ) एवं तस्मात् एष गृहाश्रमः पापः । तत्प्रसिद्धम् अन्धरज्जवलनम्-- यथा अन्धो रज्जवलनं विदधानो ने विशिष्टं निरूपद्रवं च विदधाति तथा मेहाश्रमः कर्मेति । स्नानं गजस्यायका-- यथा गजः स्नानं कृत्वा पुनरुध्दूलनं करोति तथा मेहाश्रमः पापशुद्धिं कृत्वा पुनः पापोर्जनं करोति । परन्तु उसको कष्टपूर्वक प्राप्त करके भी अन्तमें मोक्षसुखकी इच्छासे उन्हें भी वह छोडना ही पड़ा है। और तो क्या कहा जाय, किन्तु तीर्थकर भी प्राप्त राज्य लक्ष्मीको छोड देनेके पश्चात् ही जगत्का कल्याण करनेवाली आर्हन्त्य लक्ष्मी और अन्तमें मोक्ष-लक्ष्मीको प्राप्त करते हैं । इस प्रकार जब समस्त विषयोंका छोडना अनिवार्य है तब सबसे उत्तम तो यही है कि ममत्वबुद्धिको छोडकर उन्हें ग्रहण ही न किया जाय, अन्यथा यदि उन्हें ग्रहण करनेके पश्चात् छोडा तो फिर उस साधके समान हंसीका पात्र बनना पड़ेगा जो भिक्षामें प्राप्त हुए लड्डूके विष्ठामें गिर जानेपर उसे धोनेके पश्चात् छोडता है। अभिप्राय यह है कि जो प्राणी तदनुकल धर्मके आचरणके विना ही मोहवश विषयोंको प्राप्त करनेके लिये निष्फल प्रयत्न करते हैं वे लोगोंको हंसीके पात्र बनते हैं। अतएव वास्तविक सुखका साधन जो धर्म है उसका ही परिपालन करना योग्य है। इससे ऐहिक एवं परलौकिक सुखकी प्राप्ति स्वयमेव होगी ॥ ४० ॥ गृहस्थाश्रम विद्वज्जनोंके भी चरित्रको प्रायः किसी सामायिक आदि शुभ कार्यमें पूर्णतया धर्मरूप, किसी विषयभोगादिरूप कार्यमें पूर्णतया पापरूप सथा किसी जिनगृहादिके निर्मापणादिरूप कार्यमें उभय
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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