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________________ ग्रहणात् पूर्वमेव परिप्रहस्य परिहार्यत्वम् ३९ सामाज्यं कयमप्यवाप्य सुचिरात्संसारसारं पुनः तत्यक्त्वैव यदि क्षितीश्वरवराः प्राप्ताः श्रियं शाश्वतीम् । त्वं प्रागेव परिग्रहान् परिहर त्याज्यान गृहीत्वापि ते मा भूमौतिकमोरकव्यतिकरं संपाय हास्यास्पदम् ॥४०॥ भवता मूलतोऽपि परिग्रहः (ह) त्यागः कर्तव्यः इति दर्शयन्नाह माम्राज्यमित्यादि। साम्राज्यं चक्रवर्तित्वम् । कथमपि महता कण्टेन । सुचिरात् बहुतरकालेने । संसारसारं संसारे सारम् उत्कृष्टम् । शाश्वतीं श्रियं मरेक्षलक्ष्मीम् । प्रागेव मूलतोऽपि अगृहीत्वैव । ते त्वया त्याज्यानपि इति सम्बन्धः त्याज्यस्य. (व्यस्थ) वा कर्तरि (जैनेन्द्रम्. १.४१७५) इति षष्ठी । इत्थंभूतानपि परिग्रहान् गृहीत्वा । स्वं माभूः हास्यास्पदम् । माभूदिति पाठे ते तव हास्यास्पदं माभूदिति सम्बन्धः । किं कृत्वा । संपाद्य संयोज्य आत्मनः । कि तत् । भौतिक-मोदकव्यतिकरं परिव्राजक्रमोदकप्रघदृकम् ययैवेह केनचितरिवाजकेन मिनायां मोदको लन्धः, स च गच्छतो गूयोपरि पतितोऽपि तेच गृहीतोऽधेव च केनचित् परिव्राजको भणित: विरूपकोऽयं मोदकः परित्यज्यतामिति । तेन चोक्तं प्रक्षात्य त्यक्ष्यामीति ॥४०॥ शाश्वतश्रियो निप्रन्यावस्यैव साधिका न गृहस्थावस्थेति दर्शयन्नाह--- मुखसे शेष रहे सूर्य और चंद्र ॥ विशेषार्थ-जिस प्रकार यद्यपि राहु सूर्य और चन्द्रको पूर्णपास ही करना चाहता है, फिर भी जो उनको भाग शेष बचा रहता है वह उसकी अशक्तिके कारण ही वचा रहता है,उसी प्रकार प्रत्येक प्राणीकी तृष्णा तो इतनी अधिक होती है कि वह समस्त जगत्को ही स्वाधीन करना चाहता है,फिर भी जो समस्त जगत उसके स्वाधीन नहीं हो पाता है उसमें उसकी अशक्ति कारण है, न कि विषय-तृष्णाकी न्यूनता ॥३९॥ जिस किसी प्रकारसे संसारके सारभूत साम्राज्य (सार्वभौम राज्य) को चिरकालमें प्राप्त करके भी यदि चक्रवर्ती उसे छोडने के पश्चात् ही अविनश्वर मोक्ष-लक्ष्मीको प्राप्त हुए हैं तो फिर तुम त्यागनेके योग्य उन परिग्रहों (विषयों) को ग्रहण करमेके पहिले ही छोड दो । इससे तुम परिव्राजकके लड्डूके समान विषयोंका सम्पादन करके हंसीके पात्र न बन सकोगे । विशेषार्थ-संसारमें सबसे श्रेष्ठ चक्रवर्तीका साम्राज्य समझा जाता है, 1ब चोक्ता।
SR No.090070
Book TitleAtmanushasanam
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorA N Upadhye, Hiralal Jain, Balchandra Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2004
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, Sermon, & Religion
File Size28 MB
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