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________________ आराधनासमुच्चयम् - ३०५ में तुझे सुपुर्द कर दिया । कहाँ तो यह तुम्हारा अनिन्द्य स्वर्गिक सौन्दर्य और कहाँ वह भील राक्षस जिसे देखते ही हृदय काँप उठता है। मैं तुझे देखकर कृतकृत्य हो गया। अपनी सारी सम्पदा की मैं तुझे स्वामिनी बनाता हूँ और मैं बनता हूँ तेरे चरणों का दास। मुझे अपने हृदय में जगह दोगी न !" ऐसा कहकर उसने अपने बाहुपाश फैलाये। स्त्री को लोग अबला, शक्तिहीन समझते हैं। परन्तु यह नहीं जानते कि स्त्री शक्तिहीन अबला नहीं। अपितु 'बलवन्तोऽपि पुरुषा यया निर्बला क्रियन्ते इति' बलवन्त महाशक्तिशाली पुरुष भी जिसके द्वारा शक्तिहीन कर दिये जाते हैं। जिसके तेजपुंज से इन्द्र का आसन भी डोल उठता है, वह अबला कैसे ? उस अबला असहाय अनंतमती ने पादप्रहार किया उस पापी पर, जिससे वह जा गिरा चार हाथ दुर। निकलने लगी मुख से खून की धारा । वह उठ ही नहीं पाया था कि अनंतमती बरस पड़ी काली मेघघटा के समान। “पापी ! नरपिशाच ! तुझे बोलते लज्जा नहीं आती, दंभी ! धर्म की ओट में शिकार करता है, बगुले सा भेष बनाये भोले प्राणियों को ठगता फिरता है, अधर्मी ! यदि अब दूसरी बार मुख से ये शब्द निकाले तो प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।" अनन्तमती के इस साहस से उसका हृदय काँप उठा। उस सती के अलौकिक तेज के सामने वह कुछ नहीं कर सका। परन्तु उसकी क्रोध अग्नि भभक गई। उसने अनंतमती को कामसेना वेश्या के हाथ में सौंप दिया। __ कर्मों की विचित्रता है। 'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतकर्म शुभाशुभं' पूर्वोपार्जित शुभ-अशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। कामसेना ने अनंतमती के प्रति धनवैभव का प्रलोभन, मारन-ताड़न आदि अनेक प्रयोग किये, परन्तु अनंतमती का मन मेरु अडोल रहा। ठीक ही है, जो संसार से भयभीत हैं, जिनका हृदय सम्यग्दर्शन के आलोक से आलोकित है, वे न्याय-प्राप्त सांसारिक भोगों से भी घबरा उठते हैं, तो अन्याय से प्राप्त की तो बात ही क्या है ! जब कामसेना ने देखा कि इस पर मेरा चक्र नहीं चलता तब वह उसको राजा सिंहव्रत के पास ले गयी और राजा से बोली, "देव ! यह रमणीरल आपकी सेवा में अर्पित करने आयी हूँ, यह अनाघ्रात कलिका आपके भोग करने योग्य है। दासी ने इसे पाने के लिए अपार धन खर्च किया है।" राजा उस दिव्य सुन्दरी को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने वेश्या को विपुल धनराशि प्रदान की। संध्या होते ही राजा अनंतमती से बोला - "हे कमलमुखी ! तुम्हारे रूप के जादू ने मुझे विह्वल कर दिया है। मेरा भन-तन मेरे आधीन नहीं है। यह विशाल राज्य तेरे श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ। तुम मेरी मनोकामना को पूर्ण करो।" राजा ने क्या कहा उस पर अनंतमती का लक्ष्य नहीं था। वह अपने ध्यान में मग्न थी। उसके मुख पर अद्भुत तेज था, सतीत्व की किरणें फूट रही थीं सर्वांग से। ज्योंही राजा ने उसका स्पर्श करना चाहा कि उसकी पीठ पर धमाधम कोड़ों की वर्षा होने लगी। मारने वाला नहीं दीख रहा था। परन्तु मार के कारण मुख से रुधिर धारा निकल रही थी। हल्ला-गुल्ला सुनकर रानियाँ आ गईं, उन्होंने जान लिया कि कोई दैविक कोप
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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