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________________ आराधनासमुच्चयम् - २१२ बहुजात्यश्व-मदद्विपरथनायकबलरथाङ्गशस्त्रादि-। चक्रेश: शरणं मत्र्येषु परेषु का वार्ता ॥१४२ ।। किंजल्कपुञ्जपिञ्जरगुञ्जज्जलविकरराजिताब्जवनम्। मदकुञ्जरवदवार्यो मृत्युप॑नाति भुवनमिदम् ॥१४३॥ यद्वन्न शरणमुग्रद्विपविशिड् वदनवर्ति-हरिणशिशोः। तद्वन्न शरणमन्तकदन्तान्तरवर्तिजनताया: ॥१४४ ।। (इत्यशरणानुप्रेक्षा) अन्वयार्थ - दुष्कर्म पाक संभव जन्म जरा मरण रोग शोकादि संपाते - दुष्कर्मों के उदय से उत्पन्न जन्म, बुढ़ापा, मरण, रोग, शोकादिक होने पर। जगत्त्रये - तीन जगत् में। किंचित् - कोई। शरणं - शरण। न - नहीं। विद्यते - है ||३९॥ स्वर्ग: - स्वर्ग जिसका। दुर्ग - दुर्ग (किला) है। वजं - वज्र जिसका। प्रहरणं - शस्त्र है। ऐरावणः - ऐरावत जिसका । गजः - हाथी है। गीर्वाणाः - देव जिसके। भृत्याः - नौकर हैं ऐसे । देवेशः - देवेन्द्र भी। शरणं - शरण। नो - नहीं हैं। परेषु - दूसरों के । वचः - कहना ही। किं - क्या ॥४०॥ बहुजात्यश्वमदद्विपरथनायक बलरथांग शस्त्रादि चक्रेशः - अनेक जाति के घोड़े, मदोन्मत्त हाथी, रथ, सेनापति, सेना, चक्र-शस्त्रादि से युक्त चक्रवर्ती भी। मत्र्येषु - मनुष्यों के । शरणं - शरण नहीं है। परेषु - दूसरों की। वार्ता - बात ही। का - क्या है ॥४१॥ किंजल्क पुंज पिञ्जर गुञ्जज्जलविकर राजिताब्जवनं - पराग के पुंज से पिञ्जरित गूंजते हुए भँवरों से शोभित कमल वन को। मदकुंजरवत् - मदोन्मत्त हाथी के समान । अवार्य: - नहीं निवारण करने योग्य। मृत्युः - मृत्यु । इदं - इस । भुवनं - संसार को। मृनाति - मर्दन करती है॥४२॥ यद्वत् - जिस प्रकार | उग्रद्विपविद्विड्वदनवर्तिहरिणशिशो: - उग्र सिंह के मुखवर्ती हरिण के बच्चे की। शरणं - शरण । न - नहीं है। तद्वत् - उसी प्रकार। अन्तकदंतान्तरवर्त्तिजनताया: - मृत्यु के दाँत के मध्यवर्ती जीवों की भी। शरणं - शरण नहीं है ।।४३॥ अर्थ - जीव के द्वारा विभाव भावों से उपार्जित दुष्कर्म के उदय से उत्पन्न जन्म, बुढ़ापा, मरण, रोग, शोक आदि विपत्तियों के बीच में भ्रमण करते हुए इस जीव का जगत् में कोई शरण वा रक्षक नहीं है। स्वर्ग जिसका अभेद्य किला है, वज्र जिसका शस्त्र है, ऐरावत जिसका हाथी है, देव जिसके चाकर हैं, ऐसा बलशाली इन्द्र भी इस जीव की मृत्यु के मुख से वा दुःख-संकट से रक्षा नहीं कर सकता, शरण देकर बचा नहीं सकता तो अन्य का तो कहना ही क्या ? अर्थात् जिस मृत्यु के मुख से प्राणियों को इन्द्र भी बचा नहीं सकता तो दूसरे निर्बल प्राणी कैसे बचा सकते हैं अर्थात् कोई भी नहीं बचा सकता।
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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