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________________ आराधनासमुच्चयम् - १९८ ज्ञानावरणादि कर्मप्रकृतियों का स्थिति पूर्ण करके उदय में आना प्रकृतिउदय है। जब प्रकृति उदय में आती है तो समय-समय में स्थिति भी उदय में आकर नष्ट होती है वह स्थिति उदय है। समय पाकर कर्म जो तीव्र-मन्द होता है, कर्मों का जीव को रस वा फल मिलता है वह रसोदय या अनुभागोदय है। प्रतिक्षण, आत्मा के बँधे हुए कर्म परमाणु उदय में आकर झड़ते हैं, जीर्ण होकर नष्ट होते हैं वह प्रदेशोदय है। अब उदीरणा का वर्णन करते हैं। स्थिति पूरी करके कर्म उदय में आते हैं, वह उदय कहलाता है और किसी कारणवश स्थिति का ह्रास कर कर्म उदय में आते हैं, वह उदीरणा कहलाती है। उदीरणा भी उदय के समान प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश के भेद से चार प्रकार की है। उनका लक्षण उदय समान कर्मों के अस्तित्व को सत्त्व या सत्ता कहते हैं, वह सत्ता भी चार प्रकार की है। प्रकृतिसत्त्व, स्थितिसत्त्व, अनुभागसत्त्व और प्रदेशसत्त्व । प्रकृति का अस्तित्व आत्मा के साथ रहता है वह प्रकृति सत्त्व है, स्थिति का रहना स्थिति सत्त्व है, कर्मों की फलदानशक्ति का रहना अनुभाग सत्त्व और कर्मप्रदेशों का रहना प्रदेश सत्त्व है। इन सब का अपाय नाश कैसे हो, इसका चिन्तन अपायविचय है। इन प्रकृतियों का नाश गुणस्थान का आश्रय लेकर होता है। उन गुणस्थानों के अनुसार कर्मप्रकृतियों की बंध व्युच्छित्ति, उदय व्युच्छित्ति, उदीरणा व्युच्छित्ति और सत्ता व्युच्छित्ति होती है। __ आत्मविकास के क्रम (गुणस्थान) के अध्ययन के सन्दर्भ में यह जानना भी सर्वथा प्रासंगिक है कि आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में अनादि काल से बाधक और जन्म-जन्मान्तर में संसरण, भ्रमण के कारण रूप जो कर्मबन्ध हैं, उनके हेतु क्या है ? बन्ध के ये हेतु मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग कहे गये हैं। इसका स्वरूप संक्षेप में इस प्रकार है - मिथ्यात्व - जीवाजीवादि सप्त तत्त्वों में अरुचि होने या श्रद्धान न होने को मिथ्यात्व कहते हैं। अविरति - अंतरंग में परमात्म स्वरूप भावना से उत्पन्न परमसुखामृत रूप जो प्रीति, उसके आस्वाद से विलग रहते हुए इन्द्रिय-विषयों के ग्रहण, भोग-उपभोग में संयम धारण न करना ही अविरति है। हिंसा, मृषा, स्तेय, अब्रह्मचर्य एवं परिग्रह इनसे गृहस्थों के लिए अणुव्रतों के रूप में अंशतः व मुनियों के लिए महाव्रतों के रूप में पूर्णत: विरत न होना अविरति कहलाती है। प्रमाद - "स च प्रमादः कुशलेष्वनादरः" अच्छे धार्मिक, स्वपरोपकारी कार्यों को करने में आदर
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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