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________________ आराधनासमुच्चयम् १६८ आदि रस रहित चावल आदि खाना। नानाभेदः - नाना भेद वाला। रसस्थागः - रसत्याग नामक तप है॥५॥ ___अर्थ - आधे आहार का नियम करना अथवा जो जिसका प्राकृतिक आहार है उससे न्यून आहार विषयक प्रतिज्ञा करना अवमौदर्य तप है अथवा जैसे पुरुष का स्वाभाविक आहार बत्तीस ग्रास है, उसमें एक ग्रास आदि कम करके लेना अवमौदर्य तप है। तृप्ति करने वाला, दर्प उत्पन्न करने वाला, जो आहार हो उसका मन, वचन, काय से त्याग कर देना चाहिए क्योंकि इनसे स्वाध्याय, ध्यान आदि में बाधा उत्पन्न होती है। जो पित्त प्रकृति के कारण उपवास करने में समर्थ नहीं हैं उनको अवमौदर्य तप अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इस तप के माहात्म्य से आहार के प्रति गृद्धि नष्ट हो जाती है, उदरजनित रोग शांत हो जाते हैं, उदरस्थ कृमि का अभाव होता है अत: यह तप अवश्य करना चाहिए। रसना इन्द्रिय से जिसका आस्वादन किया जाता है उसको रस कहते हैं। यद्यपि रसनाविषयक रस पाँच हैं खट्टा, मीठा, चर्परा, कड़वा और कषायला; तथापि यहाँ दूध, दही, घृत, नमक. तेल और चीनी गडादि छह पर हैं जिनका सेवन करने से रसनादि पाँचों इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, मन रूपी घोड़ा अवश होता है ऐसे रसों का या स्वादिष्ट भोजन का अपनी शक्ति के अनुसार त्याग करना रसपरित्याग बाह्य तप है। इस तप से इन्द्रियविषयों की अभिलाषा शांत हो जाती है। स्वाध्याय, ज्ञान, ध्यान की वृद्धि होती है और इन्द्रियसंयम और प्राणिसंयम का पालन होता है। अवमौदर्य तप के अनेक भेद होते हैं जैसे एक ग्रास, दो ग्रास, तीन ग्रास आदि ग्रहण करके कवलचान्द्रायण व्रत किया जाता है। अनन्त चौबीसी, अष्टाह्निक आदि अनेक प्रकार के अवमौदर्य तप होते एक रस, दो रस, तीन रस, चार, पाँच या छहों रसों का त्याग वा निर्विकृति भोजन करना अथवा पानी भात खाना आदि के भेद से रसपरित्याग तप अनेक प्रकार का है। वृत्ति परिसंख्यान और कायक्लेश तप का लक्षण भिक्षासमुत्थकांक्षारोधो, नानाथ वृत्तिपरिसंख्या। योगैरनेकभेदैः कायक्लेशोऽङ्गसंतपनम् ॥१०७॥ अन्वयार्थ - भिक्षासमुत्थकांक्षारोध: - भिक्षा के लिए समुत्पन्न अभिलाषा का निरोध। नाना - अनेक प्रकार का । वृत्तिपरिसंख्या - वृत्तिपरिसंख्या नामक तप है। अथ - और | अनेकभेदैः - अनेक भेद वाले। योगैः - योग के द्वारा । अंगसंतपनं - शरीर को संतप्त करना । कायक्लेश: - कायक्लेश नामक तप है। अर्थ - आहार को जाते समय घर, गली, बाजार, दाता, बर्तन, अन्न आदि का नियम लेने रूप
SR No.090058
Book TitleAradhanasamucchayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavichandramuni, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages376
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size10 MB
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