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________________ आराधनासार-९९८ यदि त्र्याध्यादिक कायस्य तर्हि आत्मा कीदृश इत्याह सुक्खमओ अहमेको सुद्धप्पा णाणदंसणसमग्गो। अण्णे जे परभावा ते सव्वे कम्मणा जणिया॥१०३ ।। सुखमयोऽहमेकः शुद्धात्मा ज्ञानदर्शनसमग्रः । अन्ये ये परभावास्ते सर्वे कर्मणा जनिताः ॥१०३ ।। सुक्खमओ इत्यादि। अनवरतस्यंदिसुंदरानंदमुद्रितामंदसुखेन निर्वृत्तः सुखमयः। अहं शरीराधिष्ठितोऽपि आत्मा शुद्धनयापेक्षया परमात्मा। यदुक्तम् यः परात्मा स एवाई योहं स परमस्ततः । अहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः ।। तथा एक्को असहायः रागद्वेषादिद्वितीयरहितः सुद्धप्पा शुद्धात्मा शुद्धश्चासौ आत्मा च शुद्धात्मा णाणदसणसमग्गो ज्ञानं च दर्शनं च ज्ञानदर्शने ताभ्यां समग्रः दर्शनज्ञानसमग्र दृशिज्ञमिस्वभाव; नियतिवृत्तिरूप: । एवंभूतात् स्वभावात् येऽन्ये ते परभावाः इत्याह अण्णे जे परभावा टंकोत्कीर्णचित्स्वभावादात्मनः सकाशात् येऽन्ये रागद्वेषमोहादयः आधिव्याधिमरणादयः ते सव्वे ते सर्वे परभावाः पुद्गलभावाः। किं विशिष्टाः । कम्मणो जणिया कर्मणः सकाशादुत्पन्नाः। अथवा। कर्मणा करणभूतेन जनिता उत्पादिताः । ततोऽहमात्मा केवलं सुखस्वभावसंपन्नो विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावोस्मीति ध्यानयोगमारूढस्य क्षपकस्य कर्मनिजरैव। यदुक्तं यदि व्याधि आदिक शरीर के हैं तो आत्मा कैसा है, ऐसा पूछने पर कहते हैं मैं एक सुखमय ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण शुद्धात्मा हूँ। शेष सर्व भाव कर्मजनित हैं अत: मुझ से भिन्न हैं, परभाव हैं ।।१०३॥ निरन्तर झरते हुए सुन्दर आनन्द से मुद्रित अमंद सुखसे निवृत्त सुखमय हूँ और शरीर में अधिष्ठित होते हुए भी मैं शुद्ध नय की अपेक्षा परमात्मा स्वरूप आत्मा है। कहा भी है - "जो परात्मा है वही मैं हूँ और जो मैं हूँ वहीं परमात्मा है। इसलिए निश्चय नय से मैं ही मेरे द्वारा उपासना करने योग्य हूँ अर्थात् मैं ही आराध्य हूँ और मैं ही आराधक है; अन्य कोई मेरा आराध्य नहीं है. ऐसी स्थिति है।" मैं एक, असहाय. रागद्वेष से रहित, दर्शन और ज्ञान से परिपूर्ण दर्शन-ज्ञान स्वभाव वाला हूँ। मेरे इन ज्ञान, दर्शन स्वभाव से अन्य (भिन्न) जो भाव हैं वे सब पर हैं। क्योंकि टंकोत्कीर्ण चित्स्वभाव वाली आत्मा से अन्य जो राग-द्वेष-मोहादि भाव हैं और आधि व्याधि मरण आदि भाव हैं, वे पौलिक कर्मजन्य हैं, कर्मों के संयोग से उत्पन्न हुए हैं इसलिए मेरे नहीं हैं। मैं शुद्धात्मा सुखस्वभाव सम्पन्न, केवल शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वभाव वाला हूँ। ऐसा विचार कर धर्म ध्यान वा शुक्ला ध्यान में आरूढ़ क्षपक के निर्जरा ही होती है। पूज्यपाद स्वामी ने इष्टोपदेश में कहा है
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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