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आराधनासार- १८५
कथंभूतेन त्वया । क्रयसंजमेण संयमन संयमः कृतः संयम इंद्रियमन:संयमनं येन स कृतसंयमनस्तेन कृतसंयमनेन संयमं प्रतिपाल्य यत्त्वमेतादृशं संन्यासोत्तममरणमाप्तवानसि तत्त्वं धन्यतमोसि ।।१२।। मन:कायोद्भवं दु:खं क्षपकस्यावश्य जायत इति विवृणोति
किसिए तणुसंघाए चिट्ठारहियस्स विगयधामस्स। खवयस्स हवइ दुक्खं तकाले कायमणुहूयं ॥१३॥
कृषिते तनुसंघाते चेष्टारहितस्य विगतधाम्नः।
क्षपकस्य भवति दु:खं तत्काले कायमनउद्भूतम् ।।१३।। हबइ भवति । किं तत्। दुक्खं दुःख। कस्य भवति । खवयस्स क्षपकस्य स्वीकृतसंन्यासस्य । कीदृशं दुःख कायमणुहूयं कायः शरीरं मनश्चित्तं कायश्च मनश्च कायमनसी ताभ्यां सकाशादुद्भूतं तत् कायमनउद्भूतं । तत्र कायजं दु:ग्नं शिा कर्णनेत्रतीततावेद गज्वरालेशदाहाद्यनेक-प्रकारं, मन:संभवं दुःख च एतद्गृहमिमे दारा एते बांधवा इयं कमला मम पुन:क्वेत्यादि संकल्पविकल्परूपं । कदा भवति दु:खं । किसिए तणुसंघाए कृषिते तनुसंधाते तनोः शरीरस्य संघातः परमाणुसचयरूपो हस्तपादाद्यगुल्यवयवरूपो वा तनुसंघातस्तस्मिन् तनुसंघाते लंघनवशादधवा तीव्रवेदनावशात् कृशतां क्षीणतां गते सति। कीदृशस्य क्षपकस्य । विगयधामस्स विगतबलस्य अत एव चिट्ठारहियस्स चेष्टारहितस्य चलनबलनादिका चेष्टा तया रहितस्य चेष्टाविवर्जितस्य। ततः क्षपकेण संविशुद्धपरमात्मभावनाबलेन वाग्मन:कायादिकं कर्म च स्वात्मस्वरूपात् पृथक् दृष्टव्यं तेन च दुःखोपशातिर्भवति । यदुक्तम् -
हे क्षपक ! तुमने इन्द्रियसंयम और प्राणीसंथम धारण कर सल्लेखन। मरण करने का उद्यम किया है। संन्यास में उत्तम मरण प्राप्त किया है तुम संन्यास में आरूढ़ हुए हो अत: तुम धन्धबाट के पात्र हो। तुम्हारे समान दूसरा कोई उत्कृष्ट नहीं है ।।१२।।
क्षपक को मन, वचन, काय से उत्पन्न दुःख अवश्य होता है। उसका विवरण करते हैं
अवलम्ब रहित, निश्चेष्ट क्षपक के शरीर को कृश करने पर उस समय शरीर और मन से कष्ट उत्पन्न होता है।॥१३॥
शिर, कर्ण, नेत्र, तीव्रतर वेदना, ज्वरावेश, दाह आदि अनेक दुख शारीरिक हैं। यह मेरा घर है, ये मेरे बांधव हैं, यह मेरी लक्ष्मी है; इस प्रकार के संकल्प-विकल्प मनोद्भव दु:ख हैं।
पुद्गल परमाणु संचय रूप तथा हस्त पैर अंगुली आदि अवयव रूप शरीर है, उस शरीर को उपवास आदि के द्वारा कृश करने पर वा तीव्र वेदना के वश शरीर के क्षीण होने पर चेष्टारहित और निरालम्ब (अर्थात् हलन-चलनादिक क्रिया रहित) क्षपक के शारीरिक मानसिक दुःख होता है। इसलिए क्षपक को संविशुद्ध परमात्मभावना के बल से मन-वचन-कायादिक कर्म को स्त्रात्म स्वरूप से पृथक् देखना चाहिए । अर्थात् रागादि विभाव भाव और मन, वचन, कार्य से शुद्ध चैतन्य स्वरूप को भिन्न समझना चाहिए। उससे ही दु:ख की उपशांति होती है अर्थात् इस भावना से ही दु:खों का नाश होता है। सो ही कहा है