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________________ आसधनासार - १३२ यथा प्रागुक्तैः राजर्षिभिरुपसर्गः सोढस्तथा त्वमपि सहस्वेत्युत्साहयन्नाह एएहिं अवरेहिं य जहं सहिया थिरमणेहिं उवसग्गा। विसहसु तुमंपि मुणिवर अप्पसहावे मणं काऊ ॥५२॥ एतैरपरैश्च यथा सोढा: स्थिरमनोभिः उपसर्गाः । विषहस्व त्वमपि मुनिवर आत्मस्वभावे मनः कृत्वा ॥५२॥ विसहसु विषहस्व मुणिवर मुनिवर क्षपक। कान् । अर्थादुपसर्गान् । जहं एएहिं अपरेहि य यथा एतैः पूर्वोक्तैः सुकुमालादिभि: अनुक्तैः संजयंतादिभिः सहिया सोढाः । के। उपसर्गाः। कीदृशैः । थिरमणेहिं स्थिरमनोभिः स्थिरचित्तैः। यथा सुकुमालसुकोशलगुरुदत्तपांडवादिभिराराधनास्वधुनीमध्यमध्यासीनरुपसर्गाः चतुर्विधाः समभावनया सोढास्तथा त्वमपि यद्युत्तमां गति जिगमिषसि तर्हि सहस्व । किं कृत्वा । अप्पसहावे मणं काऊ आत्मस्वभाव परमात्मा मनश्चित्तं कृत्वा सहस्वेत्यर्थः ।।५२॥ सुवर्णभद्रादि मुनिराजों ने भी देवकृत उपसर्ग को सहन कर चेलना नदी के तीर पर कर्मों का नाश कर मुक्तिपद प्राप्त किया है। जिस प्रकार उपरिकथित राजऋषियों (दिगम्बर महामुनियों) ने चार प्रकार के घोर उपसर्ग सहन करके उत्तम पद प्राप्त किया है, वैसे हे क्षपक ! तुम भी सहन करो। इस प्रकार क्षपक को उत्साहित करते हुए आचार्य कहते हैं हे क्षपक ! जैसे चार प्रकार का उपसर्ग सकमाल और अन्य मनियों ने स्वकीय मन को स्थिर करके सहन किया है, वैसे तुम भी स्व-आत्मभाव में मन को स्थिर करके उपसर्ग सहन करो॥५२॥ हे क्षपक ! जिस प्रकार स्वकीय मन को शुद्ध परमात्मा के चिन्तन में स्थिर करके उपर्युक्त सुकुमाल, सुकोशल, गुरुदत्त, पाण्डव आदि महापुरुषों ने तथा जिनका कथन नहीं किया गया, जिनका नाम भी नहीं लियागया ऐसे संजयंत, अकम्पन, अभिनन्दन आदि अन्य महापुरुषों ने चार प्रकार की आराधना रूप देवगंगा के मध्य में बैठ कर समभावना के द्वारा चार प्रकार के उपसर्ग को सहन करके उत्तम गति प्राप्त की है, अविनाशी मोक्षपद प्राप्त किया है। यदि तुम भी उत्तम पद को प्राप्त करना चाहते हो तो स्वकीय मन को शुद्धात्म स्वभाव में वा परम के गुणों के चिंतन में स्थिर करके उन उपसर्गों को वा भूख, प्यास, शीत, उष्ण आदि बाधाओं को समभावों से सहन करो। संजयन्त मुनि का चरित्र वीतशोकपुर में वैजयन्त नाम का राजा राज्य कर रहा था। उसकी भव्य श्री नामक रानी की कुक्षि से दो पुत्र उत्पन्न हुए संजयन्त और जयन्त। एक दिन बिजली गिरने से हाथी की मृत्यु का समाचार सुनकर राजा का हृदय सांसारिक भोगों से विरक्त हो गया । उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर कहा- "बेटो ! तुम इस राज्य को स्वीकार करो, मैं दैगम्बरी दीक्षा ग्रहण कर के आत्मकल्याण करना चाहता हूँ।"
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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