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आराधनासार- ११४
अतो जयावती श्रेष्ठिनी गृहीतदीक्षा भर्तारं कर्णिकयाकर्ण्य गत्वा च तमेवं ततर्ज। रे दुराचार कुलपांसन बालतनयप्रतिपालनं कर्तुमशक्तस्त्वं नग्नीभूतः स्थितोसि । किं विवेकविकलस्य नग्नत्वमभिप्रेतार्थसिद्धये भवति। नग्नाः किं वृषभा न भवन्ति यतः सत्पुरुषो बालतनयमकार्यशतमपि कृत्वा प्रतिपालयति । यदुक्तम्
वृद्धौ च मातापितरौ साध्वी भार्या सुत: शिशुः ।
अपकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत् ॥ तन्नग्नीभूय किं साधित। अथ सा तद्गुरुमप्येवमुपालम्भतवती भो मुने भवतामु भार्यापुत्रयोः प्रतिपालक श्रेष्ठिनं दीक्षयता अपरीक्षितमकारि। यदुक्त
अपरीक्षितं न कर्तव्यं कर्तव्यं सुपरीक्षितम् । पश्चाद्भवति संतापो वागणी नु नशा ।।
तत्पश्चात् जयावती सेठानी "मेरे स्वामी ने दीक्षा ग्रहण कर ली हैं" ऐसा सुनकर उनके समीप जाकर तर्जना करने लगी। उनको डाँटने-गाली देने लगी।
कहने लगी, रे दुराचारी ! हे कुलनाशक । बालपुत्र का प्रतिपालन करने में असमर्थ तू नग्न होकर बैठा है। रे पापी ! विवेकहीन! तेरा नग्नत्व क्या इच्छित्त सिद्धि के लिए होगा? क्या बैल आदि पशु नग्न नहीं होते हैं? सज्जन पुरुष सैकड़ों अकार्य (नहीं करने योग्य कार्य) करके भी बाल पुत्र का प्रतिपालन करते हैं। सो कहा भी है-"वृद्ध माता-पिता, साध्वी भार्या और बालक पुत्र का सैकड़ों अकार्य करके भी पालन-पोषण करना चाहिए।" हे कातर ! नग्न होकर तूने क्या सिद्ध किया ? तुझे क्या प्राप्त हुआ ?
इस प्रकार सिद्धार्थ मुनिराज की तर्जना करके वह उनके गुरु के पास गई और इस प्रकार उलाहना देने लगी-“भो मुने ! भार्या और पुत्र का पालन करने वाले इस मेरे पति सेठ को दीक्षा देकर तूने बिना विचारे कार्य किया है। नीतिशास्त्रों में लिखा है कि-"बिना विचारे (अपरीक्षित) कार्य नहीं करना चाहिए । सुपरीक्षित कार्य ही करना चाहिए। जो मानव बिना विचारे अपरीक्षित कार्य करते हैं, उनको बाद में संताप होता है। जैसे बिना विचारे नेवले का घात करने वाली ब्राह्मणी को पश्चाताप हुआ धा।
भावार्थ-एक ब्राह्मणी ने संतान न होने से मनोरंजन के लिए एक नेवले का पालन-पोषण किया था। पश्चात् उसके एक लड़का हुआ। एक दिन ब्राह्मणी बच्चे को खाट पर सुला कर और नेवले को उसकी रक्षा में नियुक्त करके स्वयं घड़ा लेकर नदी में पानी भरने गई। पीछे से एक भयंकर सर्प आया और बच्चे की खाट पर चढ़ने लगा | नेवले ने उसको खाट पर नहीं आने दिया । नेवले और सर्प में परस्पर भयंकर संघर्ष हुआ। नेवले ने प्रहार किया जिससे सर्प की मृत्यु हो गई। नेवले को बहुत आनन्द आया । रक्तलिप्त मुख पैर वह नेवला उछलता हुआ ब्राह्मणी के सम्मुख आया। नेवले को रक्त से लिप्त देखकर ब्राह्मणी ने सोचा-इसने मेरे पुत्र को मार दिया, इसलिए क्रोध में आकर उसने पानी से भरा हुआ घड़ा नेवले पर पटक दिया, नेवले ने वहीं पर प्राण छोड़ दिए । जब घर पर आकर उसने अपने पुत्र को सुरक्षित और सर्प को मरा हुआ देखा, वह पश्चाताप करने लगी। इसलिए कहा जाता है कि जो अपरीक्षित कार्य करता है, उसको पश्चाताप होता है।