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________________ आराधनासार - ९४ क्षपयसि यावदत्र रागद्वेषोत्पादकेष्विष्टानिष्टशुद्धपरमात्मपदार्थनिरंतरचिंतनानुरागबलेन सुसमां भावना न करोषि तावत् कर्माणि क्षपयितुं परीषहजनितीव्रवेदनां सोढुं च न शक्नोषि। एवं ज्ञात्वा परीषहदुःखेषूत्पद्यमानेष्वपि परमात्मनि भावना कर्तव्या इति ।।४३ ।। ननु परीषहान् सोढुमशक्मुना ये अनेकभवगहनदु:खनिर्घाटनसमर्थं ग्रहीत चारित्रं परित्यजति तेषामिह लोके परलोके च किं फलमिति तदाह परिसहभडाण भीया पुरिसा छंडति चरणरणभूमी। भुवि उवहासं पविया दुक्खाणं हुंति ते णिलया ॥४४॥ परीषहभटेभ्यो भीता: पुरुषास्त्यजति चरणरणभूमिम्। अदि उपहास प्राशा पु:खामा भवति ते निलयाः ॥४४ ।। ये के चित् परिसहभडाण परिषहभटेभ्यः परीषहा एव भटाः शरीरेण शीतातपतापादिकठोरघातपानकत्वात् तेभ्यो भीया भीताः स्वस्वभावादन्य-मनस्कता नीता; पुरिसा पुरुषाः चरणरणभूमी चरणरणभूमि चरणं चारित्रं तदेव रणभूमिः संग्रामभूमिः व्रतसमितिगुमिप्रभृतिसैन्यपरिग्रहप्रवरविजृभमाणप्रभुत्वेन स्वरूपावस्थानसाम्राज्यभाज्यात्मनृपेण निर्बाधभेदबोधासिना अनादिकामक्रोधमोहादिसैन्यशालिनां कर्मारीणा विध्वंसत्वात् ता रणभूमि छंडति परित्यजति मुचंति। ते कथंभूता भवतीत्याह। भुवि इहलोके उवहास उपहास्यं सज्जनाना म्लानीकरणकारणदुर्जनजनजनितधिक्कारागुलिप्रसरपरस्परभ्रूविकाराविष्करणलक्षणं पाविय प्राप्ताः । परलोके च किंविशिष्टा । हुति भवंति .. हे क्षपर्क ! हे आत्मन् ! शुद्धात्मा के चिंतन के बल से रागद्वेष-उत्पादक इष्ट और अनिष्ट पदार्थों में सुसमा भावना नहीं करता है, शरीर से भिन्न आत्मभावना नहीं करता है, तब तक कमों को क्षय करने के लिए और परीषह-जनित तीव्र वेदना को सहन करने में समर्थ नहीं हो सकता। ऐसा जानकर परीषह दु:ख के उत्पन्न होने पर आत्म भावना करनी चाहिए ||४३|| जो क्षपक परीषहों को सहन करने में समर्ध नहीं है और जो अनेक भव के गहन दु:खों को नाश करने में समर्थ ऐसे ग्रहण किये हुए चारित्र को छोड़ देते हैं, ऐसे क्षपक को इस लोक में और परलोक में क्या फल मिलता है? ऐसा पूछने वाले के प्रति आचार्य कहते हैं "जो पुरुष परीषहरूपी भटों (योद्धाओं) से भयभीत होकर चारित्ररूपी रणभूमि को छोड़ देते हैं वे इस भूमि पर (इस लोक में) हँसी के पात्र होते हैं और परलोक में दुःखों के पात्र बनते हैं॥४४॥ शरीर के द्वारा शीत, उष्ण, भूख-प्यास आदि के धातक होने से, दुख देने वाले होने से परीषहों को भट (योद्धा) कहा है। जहां पर व्रत, समिति, गुप्ति आदि सैन्य के ग्रहण करने से जिसका प्रभुत्व बढ़ रहा है, ऐसा स्वस्वरूप में स्थिरतारूप साम्राज्य का भोक्त। आत्मा रूपी राजा. निर्बाध भेद विज्ञान रूपी तलवार के द्वारा अनादिकालीन काम, क्रोध, मोहादि सेना का स्वामी कर्म रूपी शत्रुओं का विळस करता है इसलिए चारित्र को संग्रामभूमि कहा है। - इस गाथा में रूपक अलंकार है। इसमें परीपहों को योद्धाओं की उपभा दी है और चारित्र को संग्रामभूमि कहा है। जिस प्रकार योद्धाओं से भयभीत होकर जो राजा रणभूमि छोड़कर भाग जाता है, वह हास्य का पात्र बनता है और दुःखों का स्थान होता है उसी प्रकार जो क्षपक परीषह रूपी योद्धाओं से भयभीत होकर
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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