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________________ आराधनासार- ९२ भो आत्मन्, अस्मिन् संसारे भवे जन्मजरामरणपरिवर्तने परवसेण निजचिरदुरार्जितकर्मविपाकत्वादन्याधीनतावस्थाविशेषेण अणेयाइं अनेकानि चतुर्गतिषु संभवत्वेन घोरासुरोदीरिततिलमात्रगावकर्तनतप्ततैलकटाहावर्तनासिपत्रवनांतरालवर्तनप्रज्वलितवालुकास्थलविहितनर्तनपरस्परप्रक्षिप्तघातछेदनक्रकचविदारणातिभारारोपणबंधदाहशीतोष्णयातदारिद्रपुत्रशोकप्रियावियोगनृपराभवसुतविहितधूतक्रीडादिदुर्व्यसनसंभवपरपरमार्द्धि-दर्शनोद्भवमानसिकादिभेदात् अनेकभेदानि दुक्खाइ दुःखानि । किंकृतानि । सहियाई सोढानि त्वया अनुभूतानि आस्वादितानि सेवितानीतियावत् । इण्हं इदानी संप्रति तपश्चरणावस्थायां सवसो स्ववश: आत्माधीर सन् अप्पसहावे आत्मस्वभावे स्वस्वरूपे प्रणो मनश्चित्तं किच्चा कृत्वा विसहसु विषहस्व विशेषेण सहस्व भो आत्मन् त्वमिह तपोनुष्ठाने हठात्केनापि न नियुक्तस्त्वमेवं कुरु त्वं स्वयमेव संसारशरीरभोगेषु विरज्य तपसि परायणो जातोसि अतस्तावकीना स्वाधीना प्रवृत्ति: न पराधीनता कापीह । पूर्व तावदेव योनिषु संसारे पराधीनतां गतेन स्वसामर्थ्याभावादनेकभेदानि दुःखानि भुक्तानि अधुना हठग्राहितचारित्वात् स्ववशः सन् शुद्धभावे मनो विधाय परीषहान् सहस्वेति भावः॥४२॥ हे आत्मन् ! जन्म, मरण, बुढ़ापा आदि से परिवर्तनशील इस संसार में स्वकीय परिणामों से चिरकाल से उपार्जित कर्म विपाक के आधीन होकर (परवश होकर) चारों गतियों में होने वाले अनेक दुःख सहन किये। अर्थात् नरक गति में असुरों के द्वारा उदीरित घोर दुःख-तिल-तिल के बराबर शरीर के टुकड़े करना, तप्तायमान तेल की कड़ाई में पकाना, गर्म कर लोहे की पुतली को चिपकाना, सेमर वृक्ष के पत्ते के गिरने से शरीर का विदारण, करोत से काटना आदि अनेक दुःख सहन किये। तिर्यंच गति में अतिभार का ढोना, भूख-प्यास, शीत-उष्ण के दुःख सहन किये हैं। मनुष्य गति में दरिद्रता, पुत्र कलत्र आदि प्रिय वस्तु के वियोगजन्य, राजा के द्वारा पराभव, जुआ आदि सप्तव्यसनी पुत्रजन्य आदि दुःख सहन किये। देव गति में अधिक वैभवशाली देवों को देखकर मानसिक दुःखों को सहन किया है। हे आत्मन् ! तूने इस प्रकार कर्माधीन होकर चार गति रूप चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करके अनन्तानन्त दुःखों को सहन किया है। अब इस समय तपश्चरण काल में स्ववश होकर, अपने मन को आत्मस्वभाव में स्थिर करके इन कष्टों को सहन करो। हे आत्मन् (हे क्षपक)! किसी ने जबरदस्ती तुझे तपो अनुष्ठान (तपश्चरण) में नियुक्त नहीं किया है। तुम स्वयमेव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त होकर तप में परायण (तत्पर) हुए हो। इसलिये तुम्हारी स्वाधीन वृत्ति है, किसी प्रकार की इसमें पराधीनता (जबरदस्ती) नहीं है। __ हे आत्मन् ! अनादिकाल से इस संसार में चौरासी लाख योनियों में कर्मों की पराधीनता से, स्वसामर्थ्य के अभाव से शारीरिक मानसिक आदि अनेक प्रकार के दुःखों को भोगा है, सहन किया है। इस समय तुमने स्ववश होकर स्वकीय इच्छा से व्रत अनुष्ठान, सन्न्यास धारण किया है, सन्यास स्वीकार किया है। इसलिए इस समय आत्मस्वभाव में स्थिर होकर अपने मन को स्वमें लीन कर परमात्मा का ध्यान करो, आत्मस्वभाव का चिन्तन करो। किसी प्रकार से खेद-खिन्न नहीं होते हुए इन भूख आदि परीषहों को सहन करो ॥४२॥
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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