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________________ आराधनासार -८९ हितोपदेशकथामार्गकुशलस्य बहुतत्त्वपरवादिविजयिनः प्रणामभक्तिसंभ्रमासनप्रदानादीनि न मे कश्चित् करोति वरं मिथ्यादृशः स्वसमयगतमज्ञमपि सर्वज्ञसंभावनया सन्मान्य स्वसमयप्रभावनां कुर्वन्ति व्यंतरादयः पुरात्युग्रतपसा प्रत्युग्रपूजां निवर्तयंतीति यदि न मिथ्याश्रुतिस्तदा कस्मादस्मादृशां एते समयगता अनादरं कुर्वन्ति इति प्रणिधानरहितचित्तस्य मानापमानयोस्तुल्यस्य सत्कारपुरस्कारपरिषहजयः ।।१९॥ अंगपूर्वप्रकीर्णकविशारदस्य अनुत्तरवादिनो मम पुरस्तादितरे भास्करप्रभाभिभूतोद्योतखद्योतवनितरामवभासते इति ज्ञानमदनिरास: प्रज्ञापरीषहजयः ॥२०॥ अज्ञोऽयं न किंचिदपि वेत्ति पशुसमः इत्याद्यधिक्षेपवचन सहमानस्य सततमध्ययनरतरः शिवृत्तानिशारोबायोल्म महोपलालायिनोद्यापि मे ज्ञानातिशयो नोत्पद्यते इत्यनभिसंदधतो अज्ञानपरीषहजयः ॥२१।। दुष्करतपोनुष्ठायिनो वैराग्यभावनापरस्य ज्ञातसकलतत्त्वस्य चिरंतनव्रतिनो अद्यापि में ज्ञानातिशयो नोत्पद्यते महोपवासाद्यनुष्ठायिना प्रातिहार्यविशेषा: प्रादुरभूवन्निति प्रलापमात्रमर्थि के यं प्रव्रज्या विफलं व्रतपालनमित्येवमचिंतयतो दर्शनविशुद्धियोगाददर्शनपरीषहसहनम् ।।२२ ।। अनेक बार मैंने वादियों को शास्त्रार्थ में पराजित किया है, चिरकाल से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहा हूँ, स्वसमय एवं परसमय का ज्ञाता हूँ और हित का उपदेश देने वाले कथामार्ग में कुशल हूँ, अर्थात् हित का उपदेश देने में कुशल हूँ फिर भी कोई मेरा आदर-सत्कार नहीं करते, मुझे प्रणाम नहीं करते, बैठने के लिये उच्चासनादि नहीं देते- "मुझ से अच्छे तो वे मिथ्यादृष्टि साधु हैं जिनकी मिथ्यादृष्टि जीव सर्वज्ञ की संभावना से सम्मान करके अपने धर्म की प्रभावना करते हैं। जो ऐसा कहा जाता है कि उग्र तपस्या करने वालों की व्यंतरादि देव पूजा करते हैं, यह सब झूठ है।" हमारे धर्मावलम्बी हमारा अनादर क्यों करते हैं ? जिनके मान-अपमान में तुल्य भाव है, जो कभी मान-सन्मान नहीं मिलने पर मलिनचित्त नहीं होते हैं, वे सत्कारपुरस्कार परीषह विजयी कहलाते हैं ॥१९॥ ___ मैं अंगपूर्व और प्रकीर्णक का विशारद हूँ, अनुत्तरवादी भी मेरे सामने सूर्य की प्रभा से तिरस्कृत हुए खद्योत के समान प्रतिभासित होते हैं; इस प्रकार ज्ञान का मद नहीं करते हैं वे प्रज्ञापरीषह विजयी होते हैं।।२०।। 'यह महामूर्ख है, कुछ भी नहीं जानता है, पशु के समान है', इत्यादि आक्षेप वचनों को सुनकर भी जो शांतभाव धारण करते हैं, निरन्तर ध्यानाध्ययन में लीन रहते हैं, जो अनिष्ट मन वचन कायकी चेष्टा से रहित हैं, मैं महोपवास आदि का अनुष्ठान करने वाला महातपस्वी हूँ फिर भी आज तक मुझे ज्ञान के अतिशयादि उत्पन्न नहीं हुए हैं; ऐसा विचार नहीं करते हैं वे अज्ञान परीषह विजयी होते हैं।॥२१॥ 'मैं दुष्कर तप का अनुष्ठान करने वाला हूँ, वैराग्य भावना में तत्पर हूँ, सकल तत्त्वों का ज्ञाता हूँ, चिरकाल से दीक्षित है तथापि आज तक मुझे ज्ञानादि अतिशय उत्पन्न नहीं हुए हैं। शास्त्रों में कथन है कि महोपवास आदि का अनुष्ठान करने वालों को प्रातिहार्य विशेष (महाऋद्धि आदि) उत्पन्न होते हैं। यह केवल प्रलाप मात्र है- वास्तविक नहीं है, यह दीक्षा व्यर्थ है, व्रतों का पालन करमा निष्फल है।' दर्शनविशुद्धि के कारण इस प्रकार का चिंतन नहीं करने वाले साधु अदर्शन परीषह विजयी होते हैं ॥२२ ।। इस प्रकार इन बावीस परीषहों के स्वरूप को जानना चाहिए।
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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