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________________ आराथनासार-६६ पंचेंद्रियाणि तान्येव महासुभटास्तेषा। न केवलं इंद्रियमल्लानां जयं। संजमणं संयमनं संकोचनं। कस्य । मणगयपसरस्स मनोगजप्रसरस्य मनश्चित्तं तदेव गजो हस्ती तस्य प्रसर: स्वेच्छापरिभ्रमणं तस्य प्रथममो भूत्वा संगत्यागं करोति तदनु कषायसल्लेखनां करोति पुनः परीषहसेनां जयति तथा उपसर्गान् सहते इन्द्रियमल्लानां च जय करोति मनोगजप्रसरं च निरोधयति । एवं सामग्री समील्य क्षपक: कर्माणि क्षपयतु । इति सप्तमस्थलसमुदायसूचनायां गाथाद्वयं गतं ।।२२॥२३॥ इदानीमादावेव निर्दिष्टस्याहस्य लक्षणमाह अस्यैव ज्येष्ठत्वात् छंडियगिहवावारो विमुक्कपुत्ताइसयणसंबंधो। जीवियधणासमुक्को अरिहो सो होइ सण्णासे ॥२४॥ __ त्यक्तगृहव्यापार: विमुक्तपुत्रादिस्वजनसंबन्धः। जीवितधनाशामुक्तः अर्हः स भवति सन्न्यासे ।।२४ ।। होइ भवति । कोसौ। अरिहो अर्ह: योग्यः। क्व । सण्णासे संन्यासे अयोग्यहानयोग्योपादानलक्षणसंन्यासः तस्मिन् । सो स किंविशिष्टो भवति । छंडियगिहवावारो त्यक्तगृहव्यापार: त्यक्ता अनंतसंसारकारणकारित्र्यापारावारपारगसहजशुद्धचिच्चमत्काररसास्वादविशेषव्यापृतपरमात्मपदार्थविलक्षणा असिमसिकृषिपशुपाल्यवाणिज्यादयो गृहव्यापारा येनासौ। जीतने वाला, स्वकीय मन रूपी हाथी को संथम की सांकल से बाँधने वाला क्षपक ही संन्यास धारण (समाधि-मरण) करने योग्य होता है। इस प्रकार का क्षपक ही अनादि काल से आत्मा के साथ एकक्षेत्रावगाही होने वाले ज्ञानावरणादि कर्मों का नाश कर सकता है। इस प्रकार सप्त स्थल सूचक दो गाथाएँ पूर्ण हुईं ।।२२-२३॥ अब सर्वप्रथम निर्दिष्ट (कथित) अर्ह' का लक्षण कहते हैं, क्योंकि अर्ह ही सर्व में श्रेष्ठ है। अर्थात् संन्यास ग्रहण करने के योग्य पुरुष को अर्ह कहते हैं, उसका कथन करते हैं। __ "जिसने गृह सम्बन्धी व्यापार छोड़ दिया है, पुत्र-पौत्रादिक के सम्बन्ध से जो विमुक्त है और जीवित (जीवन) एवं धन की आशा से रहित है, ऐसा क्षपक ही संन्यास ग्रहण करने के योग्य होता है॥२४॥ अयोग्य का त्याग करना और योग्य को ग्रहण करना संन्यास कहलाता है। अनन्त संसार के कारणभूत व्यापार से रहित सहज शुद्ध चित्- चमत्कार के रसास्वादन से युक्त परमात्म पदार्थ से विलक्षण असि (तलवार का काम अर्थात् युद्ध करना), मसि (लेखन का काम करना). कृषि (खेती करना, पशुपालन), वाणिज्य (व्यापार) आदि जो गृहस्थ की आजीविका के साधन हैं उनको गृहव्यापार कहते हैं। इस गृहव्यापार को छोड़ने वाला मानव ही संन्यास के योग्य होता है। RING
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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