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________________ आराधनासार-६५ अर्हः संगत्यागं कषायसल्लेखनां च कर्तव्या। परिषहचमूना विजयमुपसर्गाणां तथा सहनम् ।।२२।। इन्द्रियमल्लानां जयं मनोगतप्रसरस्य तथा च संयमनम्। कृत्वा हंतु क्षपकः चिरभवबद्धानि कर्माणि ॥२३ ।। युग्मम् । हणउ हंतु निराकरोतु । कोसौ। खवओ क्षपक: कर्मक्षपणशीलः। किंविशिष्टः। अरिहो अर्हः संन्यासयोग्यः। कानि । कम्माई कर्माणि ज्ञानावरणादिलक्षणानि। किंविशिष्टानि । चिरभवबद्धानि पूर्वोपार्जितानि । किमारभ्य। काऊण कृत्वा संगच्चाओ संगत्यागं। इहार्षेयत्वात्कर्मस्थाने प्रथमायां न दोषः। बाह्याभ्यंतरपरिग्रहलक्षणः संगस्तस्य त्यागः परित्यजनं तं । न केवल संगत्याग। कृत्वा कसायसल्लेहणा य कषायसल्लेखनां च कषायाः क्रोधमानमायालोभक्षणास्तेषां सल्लेखना संन्यापः सर्वथा परिहार: तां कषायसल्लेखनां। किंविशिष्टां । कायब्वा कर्तव्यां मुमुक्षुभिरवश्यमेव करणीयां तदकरणे साध्यसिद्धेरभावात् । न केवलं कर्तव्यां कषायसल्लेखनां च । कृत्वा । विजओ विजयमभिभवं। कासां। परिसहचमूण परीषहचमूनां बुभुक्षादि-द्वाविंशतिपरीषहसेनानां । न केवलं परीषहचमूनां विजयं । कृत्वा सहणं सहनं मर्षणं क्षमणामिति यावत्। केषां। उवसग्गाणं उपसर्गाणां सचेतनाचेतनेभ्यः समुत्पन्नोपप्लवानां। कथं। तहा तथा। न केवलं उपसर्गाणां सहन जओ जयं विजयलक्षणं। केषां। इंदियमल्लाण इंद्रियमल्लानां स्पर्शनादिलक्षणानि कर्मों का क्षय करने में जो तत्पर है, उसे क्षपक कहते हैं। जो क्षपक बाह्याभ्यन्तर परिग्रह का त्याग करता है, कषाय-सल्लेखना (आत्मपरिणामों की घातक क्रोध, मान, माया और लोभ रूप कषाय का त्याग करता है) अर्थात् आराधना के इच्छुक क्षपक को कषायों को कृश अवश्य करना चाहिए। क्योंकि कषायों को कृश किये बिना साध्य (समाधि) की सिद्धि नहीं हो सकती। क्षपक को भूख, प्यास आदि बावीस परीषह रूपी सेना को भी सहन करना चाहिए। निज शुद्धात्म भावना द्वारा परीषहों को जीतना चाहिए। चेतन कृत और अचेतन कृत, दो प्रकार के जो उपसर्ग हैं उनको भी सम भाव के द्वारा सहन करना चाहिए। स्पर्शनादि पंचेन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से रोकना चाहिए। ये पंचेन्द्रियाँ महासुभट हैं, मानव को कुमार्ग में पटक देती हैं अतः इनके आधीन नहीं होना चाहिए। स्वेच्छा से विषय रूपी वन में भटकने वाले मनरूपी हाथी को अपने वश में करना चाहिए। __ अर्ह, परिग्रह का त्यागी, कषायों का शमन करने वाला, परीषह को सहन करने वाला; चेतनकृत अचेतन कृत उपसर्ग आने पर भी स्वकीय स्वभाव से विचलित नहीं होने वाला, इन्द्रिय रूपी सुभटों को
SR No.090057
Book TitleAradhanasar
Original Sutra AuthorDevsen Acharya
AuthorRatnakirtidev, Suparshvamati Mataji
PublisherDigambar Jain Madhyalok Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages255
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Religion
File Size6 MB
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