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________________ भरत चक्रवती का साम्राज्य - विस्तार भाईयों का और पोदनपुर में बैठे बाहुबली का ध्यान रहा ही नहीं क्योंकि वे तो सगे भाई हैं, भरत के चक्रवर्तित्व की प्रतिष्ठा के सहभागी । लेकिन नहीं, जब तक भाई अपने-अपने राज्यों को आपके साम्राज्य की अधीनता में विलीन नहीं कर देते, तक दिग्विजय पूरी नहीं होती ।" तब "ठीक तो है", भरत ने कहा । "इतनी बड़ी दिग्विजय के अवसर पर मुझे स्वयं ही अपने भाईयों को बुलाना चाहिये था। कोई बात नहीं, अब लिखे देता हूँ ।" 15 दूत चक्रवर्ती का पत्र लेकर भाईयों के पास पहुँचे। 99 भाईयों ने निर्णय किया कि वह पराधीनता स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन युद्ध भी नहीं करेंगे। वे सब तत्काल तीर्थंकर आदिनाथ के समवसरण में पहुँचे और चरण-वन्दना करके निवेदन किया - "प्रभो ! भरत हमें अपनी आज्ञा में बांधकर हमसे प्रणाम करवाना चाहता है | वह आपके दिए हुए राज्य को अपने वश में करना चाहता है। हम प्रणाम करेंगे तो केवल आपको ही, अन्य को नहीं । भरत के मन में घोर अहंकार और लोभ उत्पन्न हो गया है ।" भगवान ने करुणा-पूर्ण वचन कहकर सान्त्वना दी : " भरत का पुण्य जब तक प्रबल है वह राज्य करेगा, साम्राज्य का विस्तार करेगा । तुम लोग अपने मन से क्रोध, मान, माया और लोभ का परित्याग करो। तुम्हारे मन में धर्मभाव जगा है । ईर्ष्या को छोड़ो !" तदलं स्पर्द्धया, दध्वं यूयं धर्म- महातरोः । दया - कुसुममम्लानि तन्मुक्तिफलप्रदम् ॥ - छोड़ दो स्पर्धा : उस धर्मरूपी महावृक्ष का आश्रय लो जिसमें दया के फूल खिलते हैं जो कभी म्लान नहीं होते; और जिससे मुक्ति का फल प्राप्त होता है ।" धर्मोपदेश सुनकर समस्त 99 सहोदरों ने भुनिव्रत ग्रहण कर लिया । उधर भरत का पन लेकर अश्वारोही नायक पोदनपुर पहुँचा । अनेक द्वारपालों को सूचना देते हुए, महाराज भरत के पत्र की राजमुद्रा दिखाते हुए उसने बाहुबली के सभागृह में प्रवेश किया । झुककर प्रणाम किया, भरत का पत्र दिया और विनम्रभाव से बाहुबली की भाव-भंगिमा को देखता रहा। फिर बोला : "मुझे कुछ मौखिक निवेदन करना है, प्रभु ।" "कहो, क्या कहना है ?" बाहुबली ने कहा । साथ ही, पूछा " दिग्विजय की यात्रा से श्रम श्रान्त मेरे अग्रज प्रसन्न तो हैं ? बहुत दिनों बाद उन्होंने हमें याद किया। ठीक ही तो है, वह इतनी बड़ी पृथ्वी के स्वामी हैं । उन्हें बहुत लोगों की चिन्ता रहती है । उन्होंने समस्त दिशाएँ वश में कर ली हैं । समरत राजाओं को जीत लिया है। अब तो कोई चिन्ता शेष नहीं रही है न ?” , दूत बोला- "महिमामय, आपका प्रश्न बहुत सार्थक है । आप दूरदर्शी हैं। चक्रवर्ती महाराज ने आपको निमंत्रित किया है कि दिग्विजय पूर्णता को प्राप्त हो
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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