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________________ अन्तर्द्वन्द्वी के पार युग के चक्रवतियों में प्रथम हूँ। इसके अतिरिक्त मुझ विजयी ने दिग्विजय के समय समस्त पृथ्वीमण्डल को अपने पराक्रम के घेरे में बांध लिया है। जिसके जल और थल में चलने वाले अठारह करोड़ घोड़े हैं; जिसकी विजयी सेना में चौरासी लाख मदोन्मत्त हाथी हैं। जिसकी दिग्विजय के समय सेना की धूसर धूल ने चारों ओर उठी हुई समस्त दिशाओं और आकाश को आच्छादित कर दिया है; चन्द्रमा की कलाओं के समान जिसका निर्मल यश समस्त दिशाओं में व्याप्त है। जिसका कीर्तिगान कुलपर्वतों के मध्यभाग में बसे देवता बारंबार करते हैं; दिग्विजय के समय तीव्रगामी चक्र के पीछे-पीछे चलने से जिसकी श्रान्त सेनाओं ने हिमवान् पर्वत की तराई का उल्लंघन कर दिशाओं के अन्त भाग में विश्राम किया है। जो श्री नाभिराय का पौत्र है, श्री वृषभदेव का पुत्र है; जिसने छह खण्डों से सुशोभित इस समस्त पृथ्वी का पालन किया है। जो समस्त राजाओं को जीतनेवाला है-ऐसे मुझ भरत ने लक्ष्मी को नश्वर समझकर जगत् में फैलने वाली अपनी कीति को इस पर्वत पर स्थापित किया है।" भरत ने प्रशस्ति उकेरकर जब उसका वाचन किया तो उसे उसकी गरिमा पर सन्तोष हुआ। पुराणकार कहते हैं कि चक्रवर्ती के गौरव को मान देने के लिए देवताओं ने आकाश से पुष्प-वर्षा की। दिग्विजय की सम्पूर्णता अब सामने थी। पृथ्वी की परिक्रमा समाप्ति पर थी। अयोध्या में प्रवेश करने से पहले भरत ने कैलाश पर्वत पर जाकर धर्मतीर्थ की महिमा से मण्डित परम वीतराग प्रभ आदिनाथ के दर्शन किये, उनकी उपासना की। चारों दिशाओं में फैले संसार की दिग्विजय के उपरान्त भरत का विजय-चक्र, सफलता के गौरव से दीप्त, वापस अयोध्या की सीमा तक आ पहुंचा। नगरवासी उमड़ पड़े स्वागत के लिए । दुन्दुभियों की ध्वनि में शब्द खो गये । चक्ररत्न परकोटे को पार करना ही चाहता था कि अचानक रुक गया। 'कोई कारण नहीं कि चक्र रुके।' भरत ने बारबार सोचा---'चक्रवर्ती का चक्र तो रुकता ही नहीं, जब तक अवरोध सामने न हो।' "मैं तो विश्व-विजय कर चुका, फिर चक्र को कुंठित करने की धृष्टता किस देव-दानव, मन्त्र-तन्त्र की है ? चक्रवर्ती का चक्र तो रुकता नहीं, रुक ही नहीं सकता। फिर यह दुर्घटना क्यों ?" सरसराते वाण की तरह सेना में, कटक में, नगर में, जन-जन की जानकारी में, कानों-कान सूचना पहुँच चुकी थी कि भरत का चक्र रुद्ध हो गया। भयानक निस्तब्धता । मन्त्री भयभीत हुए। वह कुछ न बता पाये, तो नैमित्तिकों, ज्योतिषियों का आह्वान हुआ। निमित्तज्ञानी ने बताया : ___ "यह ठीक है कि संसार के नरेश और जल-थल के अपने-अपने क्षेत्र के स्वामी -मनुष्य तथा देव, सब झुकते चले आये हैं किन्तु महाराज भरत को अपने 99
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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