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________________ अन्तद्वंन्द्रों के पार उपलब्धि का द्योतक था, और पुत्र की उत्पत्ति 'काम' पुरुषार्थ की अभिव्यक्ति थी। __ तीनों ही घटनाएं महत्त्वपूर्ण थीं। भरत के मन में कुछ क्षणों के लिए संकल्पविकल्प हुआ कि पहले किस सौभाग्य की अभ्यर्थना करें। सोचा, तो यही निर्णय किया कि सबसे पहले भगवान आदिनाथ के समवसरण में जाकर केवलज्ञानी प्रभु की पूजा की जाये जो पूज्य पिता भी हैं । 'धर्म' जो चौथे और सर्वोच्च पुरुषार्थ 'मोक्ष' का साधक है, वही सर्वप्रथम वन्दनीय है । भरत ने जाकर तीर्थंकर भगवान की अर्चना की, उनसे धर्मोपदेश सुना। उसके उपरान्त वह राजप्रासाद में गये । प्रसूति की शुचिता और शोभा से प्रसन्न-वदन अपनी वल्लभा स्त्रीरत्न सुभद्रा की गोद में खेलते पुत्र का मनोरम मुख देखकर भरत पुलकित हुए। नगरी पुत्रोत्सव की रंग-शाला बन गई। तत्पश्चात् वह गये आयुधशाला में । वहाँ देवी-प्रभा से दीप्तमान् चक्ररत्न की पूजा की-पुण्य-प्रताप का वरदान जो विश्व की विजय-यात्रा का सन्देश-वाहक था और जिसकी सार्थकता को भरत अपने पराक्रम से प्रमाणित करने के लिए उद्यत थे। चक्रवर्तित्व का वह प्रेरणा-प्रतीक पूजनीय था। धीरे-धीरे आयुधशाला में अन्य रत्न भी दृष्टिगोचर हो गये-छत्र, दण्ड, असि आदि। जिस प्रकार तीर्थंकर को जन्म से ही तीर्थंकरत्व प्राप्त होता है, किन्तु उसे त्याग, संयम, साधना और तप से कर्मबन्ध का नाश करना पड़ता है क्योंकि मोक्ष स्वयं-सिद्ध उपलब्धि नहीं है, उसी प्रकार चक्ररत्न की प्राप्तिमात्र से ही चक्रवर्तित्व प्रतिष्ठापित नहीं हो जाता। उसे अपने प्रभाव, पराक्रम और दिग्विजय के प्रयास द्वारा सार्थक करना होता है। ___ संसार के सभी नरेशों को अपनी अधीनता में करने के लिए और विश्व की धरा एवं सम्पदा पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए भरत ने अपनी असंख्य सेना, राजाओं के दल-बल और लाखों-करोड़ों अश्वों, हाथियों, रथों और वाहनों के साथ दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। चक्ररत्न आगे-आगे चल रहा था कि चक्रवर्ती की विजय-कामना के प्रति किसी को भ्रम न रहे। दण्डरत्न भी साथ-साथ था कि यदि कोई विरोध करने का साहस करे तो विनाश का प्रतीक वह दण्ड उसे परिणाम के प्रति आतंकित रखे । नियम था कि जहाँ-जहाँ से चक्र निकले वहाँ-वहाँ के अधिपति और नरेश चक्रवर्ती को नमस्कार करें और उसकी शरण में आते जायें। इन राजाओं के नगर, ग्राम और भूखण्ड चक्रवर्ती के साम्राज्य के अंग बनते चले जायें। चक्र को जो रोके, भरत की सेना से युद्ध करे और परिणाम भोगे। जहाँ जहाँ भरत का चक्र घूमा, धरा स्वयमेव विजित होती गयी। विरोधी पराभूत होते चले गये। पूर्व में अनेक वन-प्रान्तरों को पार करने के उपरान्त गंगा
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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