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________________ कुलकरों को भोगभूमि से... कुलकरों की समाज-व्यवस्था यह समय था जब मानव-समाज को ऐसे नेता की आवश्यकता हुई जो 'कुल' को संभाल सके । इन नेताओं को 'कुलकर' कहा गया है। ये ही मनस्वी नेता 'मनु' कहलाये। करोड़ों वर्षों के अन्तराल में, मन्वन्तरों में, होने वाले ऐसे चौदह कुलकर गिनाये गये हैं । मनुष्य के जीवन में जैसे-जैसे जो बाधाएँ आती गईं, उस युग के कुलकरों ने उन समस्याओं का समाधान किया। इन कुलकरों के जो नाम पुराणों में आते हैं वे उनके विशेष कृतित्व का बोध कराते हैं। - जब ज्योति देने वाले वृक्ष सूखने लगे और धरती पर प्रकाश कम होने लगा तो आकाश में स्थित सूरज और चांद धीरे-धीरे प्रकट होने लगे । लोग भयभीत हुए। पहले कुलकर 'प्रतिश्रुत' ने इन भयभीत युगलों की बात सुनी, इनका रहस्य समझाया औरइ न्हें दिन और रात के भेद से परिचित कराया। जब ज्योतिरंग वृक्षों का रहा-सहा प्रकाश भी जाता रहा तो तारों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। तब दसरे कलकर 'सन्मति' ने तारों का ज्ञान कराया। इस प्रकार ज्योतिष का सामान्य ज्ञान प्रारम्भ हुआ। तीसरे कुलकर ने बताया कि वन के पशुओं में हिंसा उत्पन्न हो गयी है, इसलिए इन से किस प्रकार सावधान रहना चाहिए, किस प्रकार अपनी रक्षा करनी चाहिए। वह 'क्षेमंकर' कहलाये । कल्पवृक्षों की कमी के कारण जब मनुष्यों में झगड़ा होने लगा तो अगले कुलकर 'सीमंकर' ने कल्पवृक्षों का सीमांकन कर दिया। बाद के कुलकर 'सीमंधर' द्वारा भूमि की सीमा नियत की गयी; 'विमलवाहन' ने पशुओं पर शासन करने की कला सिखायी। यह सात कुलकरों की कृतित्व-कथा है। आठवें कुलकर के समय में एक नयी बात हुई। इससे पहले माता-पिता अपनी युगल-सन्तान को जन्म देते ही अपनी देह छोड़ देते थे। वह नियम भंग हो गया। जीवित माता-पिता ने सन्तान को आँखों से देखा तो भयभीत हुए। तब 'चक्षुष्मान' कुलकर ने सन्तान को स्नेह से देखने और पालने-पोसने का भाव उत्पन्न किया। अगले-अगले कुलकरों ने सन्तान को नामों से पहचानने की पद्धति बतायी, रोती सन्तान को प्यार से चुप कराने की विधि बतायी । सन्तान का मुख देखकर, हर्षित होकर, कुछ समय बाद ही माता-पिता का निधन हो जाने लगा। यह समय नौवें, दसवें और ग्यारहवें कुलकर का था जिनके क्रमशः नाम हैं : यशस्वान्, अभिचन्द्र और चन्द्राभ। काल-चक्र तो घूमता ही रहता है । धरती और आकाश में परिवर्तन आये। धूप और छाया के खेल शुरू हुए। बारहवें कुलकर 'मरुदेव' ने ठण्डी हवाओं से बचने का उपाय, मेघ और विद्युत से रक्षा, नदी पार करने की विद्या तथा पहाड़ों पर पहुंचने के उपाय बताये। तेरहवें कुलकर के काल में उत्पत्ति के समय सन्तान
SR No.090050
Book TitleAntardvando ke par
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size37 MB
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