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________________ अष्टाविंशतितमं.पर्व ५५ प्रहर्षिणी लावण्यादयमभिसारयन् सरित्स्त्रीरास्रस्तप्रतनुजलांशुकास्तरङ्गैः । आश्लिप्यन्मुहुरपि नोफ्याति तृप्तिं संभोगैरतिरसिको न तृप्यतीह ॥१६॥ वसन्ततिलका रो धोभुवोऽस्य तनुशीकरवारिसिक्ताः संमार्जिता विरलमुच्चलितैस्तरङ्गैः ।। भान्तीह संततलताविगलत्प्रसूननित्योपहारसुभगा धुसदा निषेव्याः ॥१९१॥ मन्दाक्रान्ता स्वर्गाद्यानश्रिय मिव हसत्युत्प्रसूने वनेऽस्मिन् मन्दासणां सरति पवने मन्दमन्दं वनान्तात् । मन्दाक्रान्ताः सललितपदं किंचिदारब्धगानाश्चङ्कम्यन्ते खगयुवतयस्तीरदेशेष्वमुप्य ॥१९२॥ प्रहर्षिणी अप्सव्य स्तिमिरयमाजिघां सुरारादभ्येति द्रुतममिभावुकोप्सुयोनिम्"। शैलोच्चानपि निगिलंस्तिमीनितोऽन्यो व्यत्यास्ते समममुना युयुत्समानः ॥१९३॥ पृथ्वी जलादजगरस्तिमि शयुमपि स्थलादप्सुजो विकर्षति" युयुत्सया कृतदृढग्रहो दुर्ग्रहः । तथापि न जयो मिथोऽस्ति समकक्ष्ययोरेनयोधुवं न 'समकक्ष्ययोरिह जयेतरप्रक्रमः ॥१९॥ से प्रकाशमान सुवर्णमय स्थानोंको देखकर जिसे दावानलकी शंका हो रही है ऐसा यह हरिणोंका समूह बहुत शीघ्र किनारेको पृथ्वीकी ओर लौटता हुआ दौड़ा जा रहा है ॥ १८९ ॥ यह समुद्र, जिनके जलरूपी सूक्ष्म वस्त्र कुछ-कुछ नीचेकी ओर खिसक गये हैं ऐसी नदीरूपी स्त्रियोंको लावण्य अर्थात् सुन्दरताके कारण ( पक्षमें खारापनके कारण ) अपनी ओर बुलाता हुआ तथा तरंगोंके द्वारा बार-बार उनका आलिंगन करता हुआ भी कभी तृप्तिको प्राप्त नहीं होता सो ठीक ही है क्योंकि जो अत्यन्त रसिक अर्थात् कामी ( पक्षमें जलसहित ) होता है वह इस संसारमें अनेक बार सम्भोग करनेपर भी तृप्त नहीं होता है ॥१९०॥ जो छोटी-छोटी बूंदोंके पानीके सींचनेसे स्वच्छ हो गयी हैं, निरन्तर लताओंसे गिरते हुए फूलोंके उपहारसे जो सदा सुन्दर जान पड़ती हैं, और जो देवोंके द्वारा सेवन करने योग्य हैं ऐसी ये यहाँकी किनारेकी भूमियाँ विरल-विरल रूपसे उछलती हुई लहरोंसे अत्यन्त सुशोभित हो रही हैं । १९१ ॥ स्वर्गके उपवनकी शोभाकी ओर हँसनेवाले तथा फूलोंसे भरे हुए इस वनमें मन्दार वृक्षोंके वनके मध्य भागसे यह वायु धीरे-धीरे चल रहा है और इसी समय जिन्होंने कुछ-कुछ गाना प्रारम्भ किया है ऐसी ये धीरे-धीरे चलनेवाली विद्याधरियाँ इस समुद्रके किनारेके प्रदेशोंपर लीलापूर्वक पैर रखती उठाती हुई टहल रही हैं ॥ १९२ ।। इधर, इस जलमें उत्पन्न हुए अन्य अनेक मच्छोंको तिरस्कार कर उनके मारनेकी इच्छा करता हुआ यह इसी जलमें उत्पन्न हुआ बड़ा मच्छ बहुत शीघ्र दूरसे उनके सन्मुख आ रहा है और पर्वतके समान बड़े-बड़े मच्छोंको निगलता हुआ यह दूसरा बड़ा मच्छ उस पहले बड़े मच्छके साथ युद्ध करनेकी इच्छा करता हुआ खड़ा है।।१९३॥ इधर, यह अजगर जलमें-से किसी बड़े मच्छको अपनी ओर खींच रहा है और मजबूतीसे पकड़ने- । १ अभिसारिकाः कुर्वन् । २ श्लक्ष्ण । ३ तटभूमयः । ४ देवानाम् । ५ हसतीति हसत् तस्मिन् । ६ सरतीति सरत् तस्मिन् । ७ मन्दगमनाः । ८ अप्सु भवः । ९ आहन्तुमिच्छुः । १० अभिभवशीलः । ११ शङ्ख जलचरं वा। १२ वैपरीत्येन स्थितः । १३ अजगरम् । १४ मत्स्यः । १५ आकर्षति । १६ योद्धमिच्छया। १७ परस्परविहितदृढग्रहणम् । ग्रहः स्वीकारः। १८ गृहीतुमशक्यः। १९ समबलयोः । २० अपजयः ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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