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________________ सप्तचत्वारिंशत्तम पर्व ४८५ खगाद्रेः पूर्वदिग्भागे नीलादेरपि पश्चिम । सुसीमाख्योऽस्ति देशोऽत्र महानगरमप्यदः ॥६५॥ तद्भूतवनमतत्त्वं सम्यक् चित्तेऽवधारय । अस्मिन्नेताः शिलाः सप्त परस्परताः कृताः ॥६६॥ येनाऽसौ चक्रवर्तित्वं प्राप्तेत्यादेश ईदृशः । इति तद्वचनादेष तास्तथा कृतवांस्तदा ॥६॥ दृष्ट्वा तत्साहसं वक्तुं सोऽगमन्नगरेशिनः । कुमारोऽपि विनिर्गत्य ततो निर्विण्णचेतसा ॥६॥ कांचिजरावती कुत्स्यशरीरां कस्यचित्तरोः। अवस्थितामधोमागे विषयं पुष्कलावतीम् ॥६॥ वद प्रयाति कः पन्था इत्यप्राशीत प्रियं वहन् । विना गगनमार्गेण प्रयातुं नैव शक्यते ॥७॥ "स'गव्यूतिशतोत्संधविजया गिरेरपि । परस्मिन्नित्यसावाह तदाकर्ण्य नृपात्मजः ॥१॥ बहि तत्प्रापणोपायमिति तां प्रत्यभाषत । इह जम्बूमति द्वीपे विषयो वत्सकावती ॥७२॥ तरखेचरगिरौ राजपुरे खेचरचक्रिणः । देवी धरणिकम्पस्य सुप्रभा वा प्रभाकरी ॥७३॥ तयोरहं तनूजास्मि विख्याताख्या सुखावती । त्रिप्रकारोरुविद्यानां पारगाऽन्ये धुरागता ॥७४॥ विषये वत्सकावत्यां विजयामिहीधर । अकम्पनसेतां पिप्पलाख्यां प्राणसमां सखीम् ॥७५॥ ममाभिवीक्षितुं तत्र चित्रमालोक्य कम्बलम् । कथयायं कुतस्त्यस्तं तन्वीति प्रश्नतो मम ॥७६॥ नीचे बैठे हुए किसी विद्याधरको देखकर उससे पूछा कि यह कौन-सा देश है ? तब वह विद्याधर कहने लगा कि ॥४६-६४॥ विजयार्ध पर्वतकी पूर्वदिशा और नीलगिरिको पश्चिमकी ओर यह सुसीमा नामका देश है, इसमें यह महानगर नामका नगर है और यह भूतारण्य वन है, यह तू अपने मनमें अच्छी तरह निश्चय कर ले, इधर इस वनमें ये सात शिलाएँ पड़ी हैं जो कोई इन्हें परस्पर मिलाकर एकपर एक रख देगा वह चक्रवर्ती पदको प्राप्त होगा ऐसी सर्वज्ञ देवकी आज्ञा है' विद्याधरके यह वचन सुनकर श्रीपालकुमारने उन शिलाओंको उसी समय एकके ऊपर एक करके रख दिया ॥६५-६७।। कुमारका यह साहस देखकर वह विद्याधर नगरके राजाको खबर देनेके लिए चला गया और इधर कुमार भी कुछ उदासचित्त हो वहाँसे निकलकर आगे चला। आगे किसी वृक्षके नीचे निन्द्य शरीरको धारण करनेवाली एक बुढ़ियाको देखकर मधुर वचन बोलनेवाले कुमारने उससे पूछा कि पुष्कलावती देशको कौन-सा मार्ग जाता है, बताओ, तब बुढ़ियाने कहा कि वहाँ आकाश मार्गके बिना नहीं जाया जा सकता क्योंकि वह देश पच्चीस योजन ऊँचे विजया पर्वतसे भी उस ओर है, यह सुनकर राजपुत्र श्रीपालने उससे फिर कहा कि वहाँ जानेका कुछ भी तो मार्ग बतलाओ। तब वह कहने लगी- इस जम्बू द्वीपमें एक वत्सकावती नामका देश है, उसके विजयार्ध पर्वतपर एक राजपुर नामका नगर है। उसमें विद्याधरोंका चक्रवर्ती राजा धरणीकम्प रहता है, उसकी कान्तिको फैलानेवाली सुप्रभा नामकी रानी है, मैं उन्हीं दोनोंकी प्रसिद्ध पुत्री हूँ, सुखावती मेरा नाम है और मैं जाति विद्या, कुल विद्या तथा सिद्ध की हुई विद्या इन तीनों प्रकारकी बड़ी-बड़ी विद्याओंकी पारगामिनी हूँ। किसी एक दिन मैं वत्सकावती देशके विजयाध पर्वतपर अपने प्राणोंके समान प्यारी सखी, राजा अकम्पनकी पुत्री पिप्पलाको देखनेके लिए गयी थी। वहाँ मैंने एक विचित्र कम्बल देखकर उससे पूछा कि हे सखि, कह, यह कम्बल तुझे कहाँसे प्राप्त हुआ है ? उसने कहा कि 'यह कम्बल मेरी ही आज्ञासे प्राप्त हुआ है' । कम्बल प्राप्तिके समयसे ही कम्बलवालेका ध्यान करती हुई वह अत्यन्त विह्वल हो रही है ऐसा सुनकर उसकी सखी मदनवती उसे देखनेके लिए उसी १ वने । २ एकैकस्याः उपर्युपरिस्थिताः । ३ विहिता। ४ प्राप्स्यति । ५ शीतलाः । ६ नगरेशितुः ल०, ५०, अ०, स०, इ० । ७ वनात् । ८ निन्द्य । ९ अधः- ल० । १० प्रियं वदः ल० । ११ पुष्कलावतीविषयः । १२ पञ्चविंशतियोजन । १३ अपरभागे। १४ जरती। १५ चन्द्रिकेव। १६ नातिकुलसाधितविद्यानाम् । १७ महीतले ल०, प० । १८ पिप्पलायाम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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