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________________ ४८४ आदिपुराणम् तमस्मकन्यकामेष भुजंगीति खलोऽब्रवीत् । इत्यवोचत्ततः क्रुद्ध्वा दुर्धी निक्षिप्यतामयम् ॥५२॥ दुर्द्धरोरुतपोभारधारियोग्य घने वने । इत्यभ्यधान्नपस्तस्य वचनानुगमादसौ ॥५३॥ विजयाङ्केत्तरश्रेणिमनोहरपुरान्तिके । स्मशाने शीतवैताल विद्यया तं शुभाकृतिम् ॥५४॥ कृत्वा व्यत्यक्षिपत् पापी जरतीरूपधारिणम् । तत्रास्पृश्यकुले जाता काऽपि जामातरं स्वयम् ॥५५॥ स्वं ग्राममृगरूपेण स्वसुताचरणद्वये । समन्ताल्लुठितं कृत्वा तां प्रसाद्य भृशं ततः ॥५६॥ "तं पुरातनरूपेण समवस्थापयत् खला।''तद्विलोक्य कुमारोऽसौ खगाः स्वाभिमता कृतिम् ॥५७॥ 'विनिवर्तयितु शक्ता इत्याशङ्कयविचिन्तयन् । "यमाग्रयायिसंकाशकाशप्रसंवहासिभिः ॥५८॥ शिरोरुहर्जराम्भोधितरङ्गामतनुत्वचा । समेतमात्मनो रूपं दृष्टा दुष्टविभावितम् ॥५९॥ लज्जाशोकाभिभूतः सन् मच गच्छंस्ततः परम् । तत्र भोगवती भ्रातुर्हरिकेतोः सुसिद्धया ॥६०॥ विद्यया शवरूपेण सद्यः प्रार्थितया करे । कुमारस्य समुद्वम्य' निर्वान्तमविचारयन् ॥६१॥ उद्धृत्येदं विशङ्कस्त्वं पिबेत्युक्तं प्रपीतवान् । तं दृष्ट्वा हरिकेतुस्त्वां सर्वव्याधिविनाशिनी ॥६२॥ विद्याश्रितेति संप्रीतः प्रयुज्य वचनं गतः। ततः स्वरूपमापन्नः कुमारो वटभूरुहः ॥६३॥ गच्छन् स्थितमधोभागे दृष्ट्वा कचिन्नमश्चरम् । प्रदेशः कोऽयमित्येतदपृच्छत् सोऽब्रवीदिदम् ॥६॥ यह विषम सर्पिणी है। श्रीपालके ऐसा कहनेपर वह विद्याधर क्रुद्ध होकर उन्हें उस कन्याके पिताके पास ले गया और कहने लगा कि यह दुष्ट हम लोगोंकी कन्याको सर्पिणी कह रहा है । यह सुनकर कन्याके पिताने भी क्रुद्ध होकर कहा कि 'इस दुष्टको कठिन तपका भार धारण करनेके योग्य किसी सघन वनमें छुड़वा दो।' राजाके अनुसार उस पापी विद्याधरने शीतवैताली विद्याके द्वारा सुन्दर आकारवाले श्रीपालकुमारको वृद्धका रूप धारण करनेवाला बनाकर विजया पर्वतको उत्तर श्रेणिके मनोहर नगरके समीपवाले श्मशानमें पटक दिया । वहाँ अस्पृश्य कुलमें उत्पन्न हुई किसी स्त्रीने अपने जमाईको कुत्ता बनाकर अपनी पुत्रीके दोनों चरणोंपर खूब लोटाया और इस तरह अपनी पुत्रीको अत्यन्त प्रसन्न कर फिर उस दुष्टा चाण्डालिनीने उसका पुराना रूप कर दिया। यह देखकर कुमार कुछ भयभीत हो चिन्ता करने लगा कि ये विद्याधर लोग इच्छानुसार रूप बनानेमें समर्थ हैं। उस समय वह मानो यमराजके सामने जानेवालेके समान ही था - अत्यन्त वृद्ध था, उसके बाल काशके फूले हुए फूलोंकी हंसी कर रहे थे, और शरीरमें बुढ़ापारूपी समुद्रको तरंगोंके समान सिकुड़नें उठ रही थीं। इस प्रकार दुष्ट विद्याधरके द्वारा किया हुआ अपना रूप देखकर वह लज्जा और शोकसे दब रहा था । इसी अवस्थामें वह शीघ्र ही आगे चला। वहाँ भोगवतीके भाई हरिकेतुको विद्या सिद्ध हुई थी उससे उसने प्रार्थना की तब विद्याने मुरदेका रूप धारण कर श्रीपाल कुमारके हाथपर कुछ उगल दिया और कहा कि तू बिना किसी विचारके निशंक हो इसे उठाकर पी जा, कुमार भी उसे शीघ्र ही पी गया। यह देखकर हरिकेतुने कुमारसे कहा कि तुझे सर्वव्याधिविनाशिनी विद्या प्राप्त हुई है, यह कहकर और विद्या देकर हरिकेतु प्रसन्न होता हुआ वहाँ चला गया। इधर कुमार भी अपने असली रूपको प्राप्त हो गया। कुमार आगे बढ़ा तो उसने एक वट वृक्षके १ इत्युवाच ततः क्रुध्वा दुष्टो अ०, ५०, इ०, स०, ल०। २ तद्वचनाकर्णनानन्तरम् । ३ अनिलवेगः प्रकुप्य । ४ श्रीपालः । ५ खगः । ६ श्रीपालम् । ७ स्मशाने । ८ सारमेयरूपेण । ९ प्रसन्नतां नीत्वा । १० जामातरम् । ११ मायास्वरूपम् । १२ विनिर्मातुम् । १३ कृतान्तस्य पुरोगामिसदृशः। .१४ हारिभिः ल०। १५ जराम्भोधेस्तरङ्गाभ इत्यपि पाठः। १६ दुष्टविद्याधरेण समुत्पादितम् । १७ तस्मादन्यप्रदेशम्। १८ स्मशाने । १९ पूर्वोक्तभोगवतीकन्याग्रजस्य । २० श्रीपालकुमारस्य । २१ वमनं कृत्वा । २२ पिबति स्म। २३ श्रीपालम्। २४ निजरूपं प्राप्तः । २५ न्यग्रोधवृक्षस्य । वटभूरुहम् ल०। २६ वक्ष्यमाणामित्येवम्-ल०,५०,०, स०,इ०।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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