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________________ पञ्चचत्वारिंशत्तमं पत्र सुमुखस्तदा भारमिव वोढुं तदाक्षमः । स जयोऽकम्पनो देव देवस्य नमति क्रमौ ॥ ६८ ॥ लब्धप्रसाद इत्युक्त्वा क्षिप्त्वाऽङ्गानि प्रणम्य तम् । विकसदनाम्भोज समुत्थाय कृताञ्जलिः ॥ ६९ ॥ इत एवोन्मुख तत्व प्रतीच्छन्तौ मदागतिम् । आस्थातां चातकौ वृष्टिं प्रावृषो वाऽदिवार्मुचः ॥७०॥ इति विज्ञाप्य चक्रेशात् कृतानुज्ञः कृतत्वरः । संप्राप्याकम्पनं नत्वा सजयं विहितादरम् ॥ ७१ ॥ गोभिः प्रकाश्य रक्तस्य प्रसादं चक्रवर्तिनः । वेर्वा वासरारम्भस्तद्वक्त्रावजं व्यकासयत् ॥७२॥ साधुवादैः सदानैश्च संमानैस्तौ च तं तदा । "आनिन्यतुरतिप्रीतिं कृतज्ञा हि महीभृतः ॥७३॥ इत्यतर्कोंदयावाप्तिविभासितशुभोदयः । "अनृषिवान् जयः श्रीमान् सुखेन श्वासुरं कुलम् ॥७४॥ सुलोचना मुखाम्भोजषट्पदायितलोचनः । अनङ्गानणुबाणैकतूणीरायितविग्रहः ॥ ९५ ॥ तथा प्रवृत्ते सङ्ग्रामे सायकैरक्षतः क्षतः ' T ""पेलवैः कुसुमैरेभिर्विचित्रा विधिवृत्तयः ॥७६॥ अस्मितां सस्मितां कुर्वन्नहसन्तीं सहासिकाम् | समयां निर्भयां बालामाकुलां तामनाकुलाम् ॥७७॥ १२. 43 १५ ४३१ प्रकार सबके स्वामी महाराज भरतने सुमुख नामके दूतको सन्तुष्ट कर उसका मुख प्रसन्न किया और ज्येष्ठ पुत्रको छोड़कर न्यायको ही अपना औरस पुत्र बनाया । भावार्थ- न्यायके सामने बड़े पुत्रका भी पक्ष नहीं किया || ६७ | | उसी समय चक्रवर्तीकी दयाका भार वहन करने के लिए मानो असमर्थ हुआ सुमुख कहने लगा कि 'हे देव, जिन्हें आपका प्रसाद प्राप्त हो चुका है ऐसे जयकुमार और अकम्पन दोनों ही आपके चरणोंको नमस्कार करते हैं, ऐसा कहकर उस तने अपने समस्त अंग पृथ्वीपर डालकर चक्रवर्तीको प्रणाम किया और जिसका मुखरूपी कमल विकसित हो रहा है तथा जिसने हाथ जोड़ रखे हैं ऐसा वह दूत खड़ा होकर फिर कहने लगा कि "जिस प्रकार दो चातक वर्षा ऋतुके पहले बादलसे वर्षा होनेकी इच्छा करते हैं उसी प्रकार जयकुमार और अकम्पन आपके समीपसे मेरे आने की इच्छा करते हुए इसी ओर उन्मुख होकर बैठे होंगे" ऐसा निवेदन कर जिसने चक्रवर्तीसे आज्ञा प्राप्त की है ऐसे उस दूतने बड़ी शीघ्रतासे जाकर आदर के साथ महाराज अकम्पन और जयकुमारको नमस्कार किया तथा वचनोंके द्वारा अनुराग करनेवाले चक्रवर्तीकी प्रसन्नता प्रकट कर उन दोनों के मुखकमल इस प्रकार प्रफुल्लित कर दिये जिस प्रकार कि दिनका प्रारम्भ समय ( प्रातः काल ) किरणोंके द्वारा लाल सूर्यकी प्रसन्नता प्रकट कर कमलोंको प्रफुल्लित कर देता है || ६८-७२ ।। उस समय उन दोनों राजाओंने धन्यवाद, दान और सम्मानके द्वारा उस दूतको अत्यन्त प्रसन्न किया था सो ठीक ही है क्योंकि राजा लोग किये हुए उपकार माननेवाले होते हैं ॥ ७३ ॥ इस प्रकार विचारातीत वैभवकी प्राप्तिसे जिसके शुभ कर्मका उदय प्रकट हो रहा है ऐसा वह श्रीमान् जयकुमार सुखसे श्वसुरके घर रहने लगा || ७४ ॥ जिसके नेत्र सुलोचना के मुखरूपी कमलपर भ्रमरके समान आचरण करते थे और जिसका शरीर कामदेव के बड़े-बड़े बाण रखने के लिए तरकसके समान हो रहा था ऐसा वह जयकुमार युद्ध होनेपर बाणोंसे उस प्रकार घायल नहीं हुआ था जिस प्रकार कि अत्यन्त कोमल कामदेवके इन फूलोंके बाणोंसे घायल हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि दैवलीला बड़ी विचित्र होती है ॥७५ - - ७६ ।। वह जयकुमार मुसकराहट से रहित सुलोचनाको मुसकराहटसे युक्त करता था, न हँसनेपर जोर से हँसाता था, भयुक्त होनेपर निर्भय करता था, आकुल होनेपर निराकुल करता था, वार्तालाप न करनेपर १ चक्रिपा । २ अकम्पनजयकुमारौ । ३ त्वत्तः । ४ वाञ्छन्तौ । ५ मदागमनम् । ६ प्रथममेघात् । ७ चक्रवर्तिनः । ८ वाग्भिः किरणैश्च । ९ दिवसारम्भः । १० नीतवन्तौ । ११ स्थितवान् । १२ मातुलसंबन्धिनि गृहे । १३ पीडितः । १४ मृदुभिः । १५ हाससहिताम् ।
SR No.090011
Book TitleAdi Puran Part 2
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2011
Total Pages566
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size21 MB
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